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“साल-ए-इम्तिहान”

“साल-ए-इम्तिहान” — जब टूटना भी एक सबक बन जाए —     इस कविता के द्वारा कवी अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है की ज़िंदगी का हर साल हमें खुशियाँ देने के लिए नहीं आता, कुछ साल हमें तोड़ने, परखने और मज़बूत बनाने के लिए आते हैं। जब रिश्ते, हालात और उम्मीदें साथ छोड़ देती हैं, तब इंसान ख़ुद से मिलना सीखता है और अपने भीतर की ताक़त को पहचानता है और वही मुलाक़ात उसे जीना सिखा देती है। यह कविता “साल‑ए‑इम्तिहान” उसी एहसास की बात करती है कि जीतना ज़रूरी नहीं, सबसे बड़ी बात यह है कि टूट कर भी इंसान ख़ुद को खोने न दे और आगे बढ़ता रहे।   आज, ज़रा ठहर कर, ख़ुद से मिला था मैं — न कोई शिकवा था, न कोई गिला, बस वक़्त से आँख मिलाने की हिम्मत थी।   सवाल बहुत थे दिल में, मगर जवाब कम थे, हर लफ़्ज़ से भारी एक गहरा सन्नाटा था। तभी समझ आया — ये साल यूँ ही नहीं गुज़र गया, मुझे अंदर तक लिख कर चला गया।   ये साल अच्छा नहीं था, आईना भी ख़ामोशी में बहुत कुछ कह गया — हाँ, ये साल अच्छा नहीं था।   यह साल मेरे लिए राहत नहीं, एक रियाज़ था — सब्र का, तन्हाई का, और टूट कर ...