“साल-ए-इम्तिहान”

“साल-ए-इम्तिहान”

— जब टूटना भी एक सबक बन जाए —

 

 

इस कविता के द्वारा कवी अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है की ज़िंदगी का हर साल हमें खुशियाँ देने के लिए नहीं आता, कुछ साल हमें तोड़ने, परखने और मज़बूत बनाने के लिए आते हैं। जब रिश्ते, हालात और उम्मीदें साथ छोड़ देती हैं, तब इंसान ख़ुद से मिलना सीखता है और अपने भीतर की ताक़त को पहचानता है और वही मुलाक़ात उसे जीना सिखा देती है। यह कविता “साल‑ए‑इम्तिहान” उसी एहसास की बात करती है कि जीतना ज़रूरी नहीं, सबसे बड़ी बात यह है कि टूट कर भी इंसान ख़ुद को खोने न दे और आगे बढ़ता रहे।

 

आज, ज़रा ठहर कर,
ख़ुद से मिला था मैं —
न कोई शिकवा था, न कोई गिला,
बस वक़्त से आँख मिलाने की हिम्मत थी।

 

सवाल बहुत थे दिल में,
मगर जवाब कम थे,
हर लफ़्ज़ से भारी
एक गहरा सन्नाटा था।


तभी समझ आया —
ये साल
यूँ ही नहीं गुज़र गया,
मुझे अंदर तक
लिख कर चला गया।

 

ये साल अच्छा नहीं था,

आईना भी ख़ामोशी में

बहुत कुछ कह गया —

हाँ,

ये साल अच्छा नहीं था।

 

यह साल मेरे लिए
राहत नहीं,

एक रियाज़ था —
सब्र का,

तन्हाई का,
और टूट कर भी
ज़िंदा रहने का

एक अंदाज़ था।

 

कई दफ़ा लगा
अब उठ न पाऊँगा,
मगर हर गिरावट ने
मुझे और

सहनशील बना दिया।

 

यह कोई साधारण वर्ष नहीं था,
बल्कि एक ऐसी लम्बी यात्रा थी
जिसमें
मैंने टूटे सपनों के साथ
अपने ही मन के बिखरे तार गिने।


वक़्त की रेत में दफ़्न
यादों की कब्रों से
उठता रहा

एक शब्द-सितारा,
जो दर्द का समंदर
पीकर भी चमकता रहा।

 

वक़्त की गहराइयों में
मैंने अपनी ही आवाज़
खोते देखा,
फिर उसी सन्नाटे में
एक नई पहचान
मिल गई।

 

आज ज़रा वक़्त लगा कर
ख़ुद के पास बैठा,

टूटे ख़्वाब गिने,
बिखरे जज़्बात समेटा।


ये साल
बेहद सख़्त,
बेहद बे-रहम रहा —
कई दोस्तियाँ टूटीं,
कई रिश्तों की साँस थमी।

 

कुछ लोग
जो कल तक अपने थे,
आज यादों के पन्नों में
फुटनोट बन गए।
कुछ चेहरे
जो रोज़ दिखते थे,
धीरे-धीरे
नज़र और दिल से

ओझल हो गए हैं।

 

उदासी की स्याह छाया में
खोता रहा कभी,
वहम-ओ-फ़िक्र के जाल में
सोता रहा कभी।

 

कभी मेरी फ़ीलिंग्स ने घेरा,
कभी मेरी ओवरथिंकिंग ने मारा,
मेरी ही ज़हनियत
मेरे ख़िलाफ़
सबूत बन गई दोबारा।

 

हँसते चेहरे के पीछे
छुपा था एक उदास शख़्स,
जो ख़ुद ही से लड़ते-लड़ते
काफ़ी ख़ामोश हो गया।

 

डिप्रेशन की गलियों में

जब भटकता था मैं,
तो ख़्वाबों की टूटी दीवारों पर
अपनी हथेली से

उजाला रचता रहा मैं।

 

हर सुबह उठकर
ख़ुद को ज़िंदा रखने की
जंग भी लड़ता था।

हर मुस्कान एक नक़ाब था —
जो बस दूसरों को

दिखाने के लिए था।
ख़ुद के भीतर जो सन्नाटा था,
वो रूह तक उतर आया था —
और फिर वहीं से
एक नई तालीम भी मिली:
“कभी-कभी ख़ामोश रहना

भी इबादत होता है।“


कुछ रिश्तों को बचाने की
एकतरफ़ा कोशिश की,
हर बार टूटकर भी
उम्मीद की सिलाई की।

मगर हर धागा
हर बार नहीं जुड़ता,
कुछ ज़ख़्म
बस निशान बनते हैं,
भरते नहीं।

 

समझ आया —

कभी कभी,

समर्पण ही
परम विजय है —
जहाँ लड़ाई बेमानी हो,
वहाँ हार स्वीकारना
भी तो जीत है।

 

कभी‑कभी,

ख़ुद से बैठना भी

इम्तिहान लगता है,
आईने में दिखता चेहरा भी

अब अनजान लगता है।

साल यूँ गुज़र गया
जैसे मौन में
कोई दर्द लिखा गया हो,
हर पन्ने पर
बिछड़ने का
अफ़साना दर्ज हो।

 

कभी-कभी
ख़ामोशियाँ भी
बेहिसाब बोलती हैं,
बिना अल्फ़ाज़
जो कहा जाए —
वही सच्चा जवाब होता है।
हर मुस्कान के पीछे
थी एक थकान,
हर सुकून के बाद
थी एक अधूरी दास्तान।

 

मगर हर जद्दोजहद के बाद
ये समझ आया मुझे,
कि हर रिश्ता
मुक़द्दर नहीं होता
निभाने के लिए।
कुछ लोग
दिल से नहीं,
सिर्फ़ वक़्त से जुड़े होते हैं,
और वक़्त बदलते ही
अपने आप
छूट जाते हैं।

 

फिर मैंने
लेट-गो करना सीखा,
ये जाना कि
छोड़ना भी
एक मुकम्मल हुनर है।
किसी का चला जाना
इतना बुरा नहीं,
गलत शख़्स का
रुक जाना
कहीं ज़्यादा ज़हर है।

 

इस साल ने सिखाया

एक कड़वी सच्चाई —
कुछ रिश्ते ख़त्म नहीं होते —
बस ख़ामोशी से बुझ जाते हैं,
बिना अलविदा,

बिना सवालात के।

बिना कोई इल्ज़ाम,

बिना कोई सफ़ाई के।

जैसे दरिया सूखता नहीं,

बस रुख़ बदल लेता हैं।

जैसे दीपक अपनी लौ से थक कर
अपना उजाला रात को सौंप देता हैं।

 

मैंने समझा कि

ज़िंदगी हमारी सोच से नहीं चलती,
मैंने जो चाहा,

वह बिलकुल ही नहीं हुआ,

जो होना था,

वो होकर ही रहा।


इसे तक़दीर कहूँ, नसीब कहूँ

या कर्म का खेल,
नाम चाहे जो दो —

सब एक ही बात है,
मगर हक़ीक़त यही है कि

ज़िंदगी हमसे पूछ कर
फ़ैसले नहीं लेती।

ज़िन्दगी पहले सिखाती है,
फिर समझाती है।

 

मैं ईश्वर पर यक़ीन नहीं करता था,
मगर अब दिल ने ये मान लिया है,
कि हर दर्द बे-वजह नहीं आता,

हर दर्द का कोई मक़सद होता है।
कुछ ज़ख़्म रास्ता दिखाने आते हैं।

कुछ आँसू सबक छिपाते है।

कुछ टूटन बस यह सिखाने आती हैं —
कि अब तक जो सहा है,
उससे भी आगे सहने की ताक़त
अब भी बाक़ी है।

 

इस साल मैंने सब कुछ देखा —
वक़्त को रेत की तरह
फिसलते हुए,
लोगों को भीड़ में
दूर जाते हुए,
और
ख़ुद को कई बार
हारते हुए।
और साल को बदलते हुए।

 

मगर
हर हार ने मुझे
अंदर से और ज़्यादा
जागृत किया।

हर अँधेरे ने
रौशनी की कीमत बताई,
हर तन्हाई ने
ख़ुद से मिलवाया।

 

आज जब

बीते दिनों की धूल

माथे पर जमी है,
तो एहसास हुआ कि —

हार भी किसी जीत जैसी है।
ज़िन्दगी अब भी

उतनी ही मुश्किल है,

मगर पहले से ज़्यादा

सच्ची और प्यारी है,
क्योंकि अब तन्हाई भी

अपनाई हुई बीमारी है।

 

ये साल बेहतर नहीं था,
मगर बहुत कुछ सिखा गया।
मुझे कमज़ोर नहीं,
बल्कि पहले से ज़्यादा

सच्चा और ईमानदार बना गया।

इसने मुझे तोड़ा,
पर तोड़कर
एक नया आकार दिया —
वो आकार जो अब
हवाओं से नहीं डरता।

 

अब भी ज़िंदा हूँ —
अपने ही तरीक़े से

ज़िंदगी जी रहा हूँ।
लोगों की राय में

ढलने से इनकार है मुझे,
मैं टूटा ज़रूर हूँ,

मगर बिखरा नहीं हूँ।

मेरे विचारों की नींव
अब पहले से ज़्यादा मज़बूत है,
क्योंकि हर झटके ने
उसे और गहरा किया है।

 

साल बदल गया है,
और मैं भी —

अब पूरी तरह तैयार हूँ,
हर नई चुनौती का

सामना करने के लिए।

नया सूरज देखने के लिए,

नई हवा में साँस लेने के लिए।


क्योंकि जिसने

इतना सहना सिखा दिया,
वो वक़्त

अब मुझे हरा नहीं सकता।

अब यह दिल —

कोई नाज़ुक शीशा नहीं,

एक पहाड़ है —

जो हर आँधी से

लड़ने को तैयार है।

अब यह रूह नहीं,
एक दरिया है —
जो टूट कर भी

बहना जानता है।

 

ये साल मेरा इम्तिहान था,
और मैं पास हो गया,
ज़रा देर से ही सही,
मगर समझदार होकर।


“ऐ – हार्दिक” —

साल‑ए‑इम्तिहान ने सिखाया
कि जीतना ज़रूरी नहीं होता,
जीना ज़रूरी होता है।

 

और अब,
मैं बस जी रहा हूँ —
थोड़ा बेख़ौफ़,

थोड़ा बेपरवाह,
थोड़ा टूटा,

मगर पूरा।

 

 

– हार्दिक जैन। ©
  इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।

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कठिन शब्दों के अर्थ -


1. रियाज़ - अभ्यास।

2. ओझल - दूर हो जाना।

3. स्याह - गहरा अंधकार / उदासी।

4. ज़हनियत - सोचने का ढंग।

5. तालीम - सीख / शिक्षा।

6. जद्दोजहद - कठिन संघर्ष / कोशिश।

7. मुक़द्दर - भाग्य / किस्मत।

8. मुकम्मल - पूर्ण / पूरा।

9. नींव - आधार।


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