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“ग़ज़ल: वजूद-ए-नातमाम”

  “ग़ज़ल: वजूद-ए-नातमाम” “नहीं हूँ मैं”   ( — अधूरे मनुष्य की गरिमामयी स्वीकृति — )     इस ग़ज़ल के द्वारा कवी अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है की इंसान का अधूरा होना उसकी हार नहीं होता, बल्कि वही उसकी असली पहचान और गरिमा होती है। बाहर से टूटे, थके या चुप दिखाई देने वाला मनुष्य अंदर से अब भी उम्मीद, रौशनी और सफ़र को सँभाले रहता है। दुनिया उसे जैसे भी नाम दे, वह अपने वजूद को ख़ुद समझना और ख़ुद लिखना चाहता है। यह ग़ज़ल उसी शांत स्वीकृति की बात करती है जहाँ इंसान मान लेता है कि पूरा होना ज़रूरी नहीं, क्योंकि कभी-कभी अधूरापन ही सबसे सच्चा सच और सबसे गहरी याद बन जाता है।     जो दिख रहा हूँ वैसा तमाशा नहीं हूँ मैं, दुनिया के फ़ैसलों का इशारा नहीं हूँ मैं।   शिकस्त की कोई नहीं है आख़िरी दास्ताँ, वक़्त के हाथ लिखा फ़ैसला नहीं हूँ मैं।   हर मोड़ पर जिसे तुमने हारा हुआ कहा, उस हार की किताब का पन्ना नहीं हूँ मैं।   थक गया है जिस्म, पर रूह सफ़र में अब भी है, बुझा हुआ कोई मयख़ाने का चराग़ नहीं हूँ मैं।   मैं अपने दर्द को अर्थ में ढाल सकता हू...

“ कफ़न-ऐ-कब्र ”

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  “ कफ़न-ऐ-कब्र ” “मेरी आखिरी ख्वाहिश” — एक नास्तिक की वह प्रार्थना जो कभी लिखी नहीं गई। — — एक इंसान का वह कफ़न जो किसी धर्म का कर्ज़ नहीं था। —   दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:   इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि इंसान का असली रिश्ता किसी धर्म, रीति-रिवाज या मान्यताओं से नहीं, बल्कि अपनी सच्चाई और अपने भीतर की शांति से होता है। यह कविता एक ऐसे इंसान की आवाज़ है जो बहुत थक चुका है। वह भगवान से नाराज़ नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे उससे दूर हो गया है, क्योंकि उसे वहाँ कोई जवाब या सुकून नहीं मिला। कवि अपनी मृत्यु को भी अपने तरीके से जीना चाहता है। वह नहीं चाहता कि उसकी मृत्यु पर कोई धर्म हावी हो। वह सिर्फ मिट्टी में मिल जाना चाहता है, साधारण तरीके से, बिना किसी दिखावे, बिना किसी रस्म के। कवि की यह आख़िरी ख्वाहिश दरअसल एक तरह की आज़ादी है, धर्म से, पहचान से, और शायद अपने ही दर्द से भी आज़ादी। असल में, यह कविता एक आज़ाद रूह की वह आखिरी पुकार है जो दुनिया के तमाम बंधनों को छोड़कर प्रकृति की गोद में हमेशा के लिए सो जाना चाहती है।  ...