“ग़ज़ल: वजूद-ए-नातमाम”
“ग़ज़ल: वजूद-ए-नातमाम” “नहीं हूँ मैं” ( — अधूरे मनुष्य की गरिमामयी स्वीकृति — ) इस ग़ज़ल के द्वारा कवी अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है की इंसान का अधूरा होना उसकी हार नहीं होता, बल्कि वही उसकी असली पहचान और गरिमा होती है। बाहर से टूटे, थके या चुप दिखाई देने वाला मनुष्य अंदर से अब भी उम्मीद, रौशनी और सफ़र को सँभाले रहता है। दुनिया उसे जैसे भी नाम दे, वह अपने वजूद को ख़ुद समझना और ख़ुद लिखना चाहता है। यह ग़ज़ल उसी शांत स्वीकृति की बात करती है जहाँ इंसान मान लेता है कि पूरा होना ज़रूरी नहीं, क्योंकि कभी-कभी अधूरापन ही सबसे सच्चा सच और सबसे गहरी याद बन जाता है। जो दिख रहा हूँ वैसा तमाशा नहीं हूँ मैं, दुनिया के फ़ैसलों का इशारा नहीं हूँ मैं। शिकस्त की कोई नहीं है आख़िरी दास्ताँ, वक़्त के हाथ लिखा फ़ैसला नहीं हूँ मैं। हर मोड़ पर जिसे तुमने हारा हुआ कहा, उस हार की किताब का पन्ना नहीं हूँ मैं। थक गया है जिस्म, पर रूह सफ़र में अब भी है, बुझा हुआ कोई मयख़ाने का चराग़ नहीं हूँ मैं। मैं अपने दर्द को अर्थ में ढाल सकता हू...