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“ पापा, आपके हिस्से की उम्र ”

_______________________________________________________________________ “ पापा , आपके हिस्से की उम्र   ” ______________________________________________________________ ( पिता श्री निलेश जैन के चौवनवें जन्मदिवस ( 15 अक्टूबर 2026) पर : एक पुत्र की ओर से ) हमें हर थकन से बचाते रहे हैं , मगर अपनी रातें गँवाते रहे हैं।   ये चौवन बरस भी कहाँ अपने ठहरे , हमारी ख़ुशी पर लुटाते रहे हैं।   फ़क़त तीस वर्षों का अंतर नहीं है , हमें अपना बचपन थमाते रहे हैं।   कभी चाह कर भी न रो पाए खुलकर , ज़माने का फ़रमाँ निभाते रहे हैं।   कभी अपना दुख भी सुनाया न मुझको , मगर आप सबको हँसाते रहे हैं।   न पूछा कभी ख़ुद कि क्या चाहते हैं , हमारे लिए सुख जुटाते रहे हैं।   फ़रिश्ता नहीं , आप भी तो बशर हैं , मगर ख़ुद को पत्थर बनाते रहे हैं।   अधूरी तमन्ना अभी तक जवाँ है , जिसे आप हर दिन भुलाते रहे हैं।   जन्मद...

“जनाज़ा-ए-यक़ीन: भरोसे का हादसा”

  “ जनाज़ा - ए - यक़ीन : भरोसे का हादसा ” ( जिस दिन भरोसा दफ़्न हुआ )   दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में :   यह कविता केवल टूटे हुए रिश्तों की कहानी नहीं , बल्कि उस अदृश्य मृत्यु का शोकगीत है जो इंसान के भीतर तब घटित होती है , जब उसका भरोसा मर जाता है। यहाँ किसी एक व्यक्ति की बेवफ़ाई केंद्र में नहीं है ; बल्कि वह समूचा अनुभव है जहाँ हर छल , हर झूठ और हर अधूरा वादा मिलकर आत्मा के भीतर एक ऐसा कब्रिस्तान बना देते हैं , जहाँ उम्मीदें बिना शोर के दफ़्न होती रहती हैं। अंततः कवि इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इंसान लोगों से नहीं , अपने ही विश्वास के जनाज़े से हमेशा के लिए बदल जाता है।   मैंने किसी को अपनी ज़िंदगी से निकाला ही नहीं , लोग मरते रहे … मैंने किसी को मारा ही नहीं।   मैंने कभी किसी चेहरे से किनारा किया नहीं , जिसे अपना कहा , उसे फिर कभी बेगाना किया नहीं।   बस भरोसे की सड़क पर कुछ हादसे होत...