“ साधना या प्रदर्शन ? ”
“ साधना या प्रदर्शन ? ” मैं नास्तिक हूँ , मगर तेरी आस्था से बैर कैसा , तू सजदा कर , तू तप कर , तुझे रोकूँ मैं आख़िर क्यों ? मेरा सवाल सिर्फ़ इतना है , ज़रा दिल से सोचना , जो ख़ुद के लिए था , उसे दुनिया को दिखाना कैसा ? छः रोज़ के उपवासों का हिसाब लिखते हो , हर तप को तस्वीरों में सजा कर रखते हो क्यों ? अगर रब को ख़बर है तेरे हर एक आँसू की , तो फिर लोगों से अपने सब्र का शोर कैसा ? कहीं ऐसा तो नहीं , भूख देह की कम थी और नाम की , प्रशंसा की भूख ज़्यादा थी ? तप अगर अहंकार को ही और निखार जाए , तो फिर इस त्याग में त्याग बचा ही कहाँ है ? करो धर्म... ये तुम्हारा हक़ है , मैं कौन हूँ रोकने वाला , मगर धर्म जब प्रदर्शन हो जाए , तो सवाल तो होगा। तप की असली पहचान ये नहीं कि कितनों ने देखा , बल्कि ये है कि उसके बाद तुम्हें ख़ुद को दिखाने की ज़रूरत ही न रही। वरना रोज़ इबादत की तस्वीरें बदलती रहेंगी , और भीतर का आदमी , वहीं का वहीं रहेगा। सच्ची साधना शायद वही है , हार्द...