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“ कफ़न-ऐ-कब्र ”

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  “ कफ़न-ऐ-कब्र ” “मेरी आखिरी ख्वाहिश” — एक नास्तिक की वह प्रार्थना जो कभी लिखी नहीं गई। — — एक इंसान का वह कफ़न जो किसी धर्म का कर्ज़ नहीं था। —   दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:   इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि इंसान का असली रिश्ता किसी धर्म, रीति-रिवाज या मान्यताओं से नहीं, बल्कि अपनी सच्चाई और अपने भीतर की शांति से होता है। यह कविता एक ऐसे इंसान की आवाज़ है जो बहुत थक चुका है। वह भगवान से नाराज़ नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे उससे दूर हो गया है, क्योंकि उसे वहाँ कोई जवाब या सुकून नहीं मिला। कवि अपनी मृत्यु को भी अपने तरीके से जीना चाहता है। वह नहीं चाहता कि उसकी मृत्यु पर कोई धर्म हावी हो। वह सिर्फ मिट्टी में मिल जाना चाहता है, साधारण तरीके से, बिना किसी दिखावे, बिना किसी रस्म के। कवि की यह आख़िरी ख्वाहिश दरअसल एक तरह की आज़ादी है, धर्म से, पहचान से, और शायद अपने ही दर्द से भी आज़ादी। असल में, यह कविता एक आज़ाद रूह की वह आखिरी पुकार है जो दुनिया के तमाम बंधनों को छोड़कर प्रकृति की गोद में हमेशा के लिए सो जाना चाहती है।  ...

“ नज़्म-ए-मर्ग ”

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“ नज़्म-ए-मर्ग ” “जन्मदिन पर मृत्यु कामना”   ( — एक सफर, एक ख्वाब — जिसका अंत मैं चाहता हूँ अपने जन्मदिन पर — )   दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:   ज़िंदगी हर किसी के लिए खुशी का कारण नहीं होती। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके लिए वही दिन जो दुनिया के लिए सबसे ख़ास होता है, यानी जन्मदिन — उनके अंदर सबसे गहरा दर्द जगा देता है। यह कविता एक ऐसे इंसान के मन की आवाज़ है जो बाहर से सामान्य दिखता है, लेकिन भीतर से बहुत पहले ही थककर टूट चुका है, और अब बस एक सुकून भरा अंत चाहता है — उसी दिन, जिस दिन उसकी शुरुआत हुई थी। यह कविता किसी को दुखी करने के लिए नहीं लिखी गई है। इसको लिखने के पीछे सबसे बड़ी सोच यह है कि जन्मदिन जैसा दिन, जो दुनिया के लिए उत्सव है, वही किसी के लिए मौत की याद कैसे बन सकता है। जब इंसान के अंदर का जीवन खत्म हो जाता है, तो बाहर का जीवन सिर्फ एक तस्वीर बनकर रह जाता है। यह कविता उसी दरार की कहानी है, जो दिख रहा है और महसूस हो रहा है, उसके बीच की खामोश दूरी की।     आज फिर लौटकर वह तारीख़ आई है, ज़िंदगी ने जहाँ पहली अंगड़ाई ली थी। मगर अब दिल की बस...