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“ साधना या प्रदर्शन ? ”

  “ साधना या प्रदर्शन ? ” मैं नास्तिक हूँ , मगर तेरी आस्था से बैर कैसा , तू सजदा कर , तू तप कर , तुझे रोकूँ मैं आख़िर क्यों ?   मेरा सवाल सिर्फ़ इतना है , ज़रा दिल से सोचना , जो ख़ुद के लिए था , उसे दुनिया को दिखाना कैसा ?   छः रोज़ के उपवासों का हिसाब लिखते हो , हर तप को तस्वीरों में सजा कर रखते हो क्यों ?   अगर रब को ख़बर है तेरे हर एक आँसू की , तो फिर लोगों से अपने सब्र का शोर कैसा ?   कहीं ऐसा तो नहीं , भूख देह की कम थी और नाम की , प्रशंसा की भूख ज़्यादा थी ?   तप अगर अहंकार को ही और निखार जाए , तो फिर इस त्याग में त्याग बचा ही कहाँ है ?   करो धर्म... ये तुम्हारा हक़ है , मैं कौन हूँ रोकने वाला , मगर धर्म जब प्रदर्शन हो जाए , तो सवाल तो होगा।   तप की असली पहचान ये नहीं कि कितनों ने देखा , बल्कि ये है कि उसके बाद तुम्हें ख़ुद को दिखाने की ज़रूरत ही न रही।   वरना रोज़ इबादत की तस्वीरें बदलती रहेंगी , और भीतर का आदमी , वहीं का वहीं रहेगा।   सच्ची साधना शायद वही है , हार्द...

“ बस एक साँस बाक़ी थी ”

“ बस एक साँस बाक़ी थी ” शहर-ए-जिस्म में रात उतर चुकी थी , हर धड़कन अपनी बात कह चुकी थी।   न कोई ख़्वाब था , न कोई आहट , बस ख़ामोशी थी , बेहद बे-आहट।   चेहरा जैसे वक़्त से हार गया , हर एहसास कहीं जाकर मर गया।   मगर सीने में कुछ था जो चल रहा था , शायद आख़िरी सच अभी पल रहा था।   न कोई रूह थी , न कोई फ़रिश्ता , न कोई आसमाँ , न कोई रिश्ता ,   बस मिट्टी का तन था … वह भी ठहरा हुआ , और एक साँस थी… जो मरना भूल गई थी।   हार्दिक , किसे ख़बर थी कि ये कैसा वजूद था , सब कुछ ख़त्म हो गया … मौत भी आ चुकी थी , बस कुछ साँस बाक़ी थी। - हार्दिक जैन।   ©️ इंदौर।। मध्य प्रदेश ।।

“मियाद-ए-संघर्ष”

  “ मियाद - ए - संघर्ष ” ( हर जंग हमेशा नहीं चलती )     दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में :   इस ग़ज़ल के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि संघर्ष हमेशा नहीं चलता। जैसे हर दर्द , हर इंतज़ार , हर रिश्ते और हर सफ़र की एक उम्र होती है , वैसे ही इंसान के संघर्ष की भी एक सीमा होती है। एक समय ऐसा भी आता है जब इंसान हारता नहीं , बल्कि भीतर से थक जाता है। तब वह लड़ाई छोड़ता नहीं , बल्कि उसे ढोने की ताक़त कम पड़ जाती है। यह ग़ज़ल उसी ख़ामोश सच को महसूस करती है कि जीवन में सब कुछ हमेशा के लिए नहीं रहता , न तकलीफ़ , न उम्मीद , न संघर्ष। इसलिए कभी - कभी किसी का रुक जाना उसकी कमज़ोरी नहीं , बल्कि उसकी लंबी लड़ाई की सबसे सच्ची कहानी होती है।   हर एक दर्द की आख़िर कोई उम्र होती है , थकान भी अपने हिस्से की हमसफ़र होती है।   कोई तो वक़्त है जब चीख़ भी ख़ामोश पड़ जाए , सदाओं की...

संघर्ष : एक सबक़

  संघर्ष : एक सबक़ ( एक दार्शनिक नज़्म )   दर्शनात्मक टिप्पणी : ( कविता के संदर्भ में) :   इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि जीवन में संघर्ष कोई सज़ा नहीं , बल्कि इंसान को मज़बूत बनाने वाली सबसे बड़ी सीख है। मुश्किलें , असफलताएँ , दर्द और अकेलापन हर व्यक्ति के जीवन का हिस्सा हैं , लेकिन इन्हीं अनुभवों से इंसान खुद को समझता है , बदलता है और आगे बढ़ना सीखता है।   “ उन तमाम लोगों के नाम , जिन्होंने जीवन को कभी आसान नहीं पाया , फिर भी हार को अपनी पहचान नहीं बनने दिया ... ”   हर ज़ख़्म ने मुझसे यही पैग़ाम कहा , संघर्ष ही इंसान का असली मुक़ाम कहा।   जो राह में काँटे थे , रहबर वही बने , जो दर्द थे सीने में , हमसफ़र वही बने।   हर हार ने जीने का इक फ़न दे दिया , हर अश्क ने भीतर का दर्पण दे दिया।   तक़दीर की तहरीर पे ऐतबार न रहा , मेहनत के सिवा कोई भी किरदार न रहा। ...