“शब्द का मौन सम्मान”
दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में: इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है की कविता कोई बाहरी चीज़ नहीं है जो उत्सवों में या तालियों की गड़गड़ाहट में पैदा होती है। कविता तो हमारे भीतर की उस ख़ामोशी से जन्म लेती है, जिसे हमने सालों दबा के रखा होता है। कविता सिर्फ़ शब्दों को जोड़ने का काम नहीं करती, बल्कि वह इंसान के दिल की सबसे सच्ची आवाज़ होती है। यह कविता इस सच्चाई को महसूस कराती है कि कविता का असली घर किताबों के पन्नों में नहीं, बल्कि इंसान के सीने में होता है। कभी-कभी एक सफ़ेद पृष्ठ महज़ काग़ज़ नहीं होता — वह एक शांत कमरा है जहाँ सदियों की अनकही आवाज़ों का कोई काफ़िला ठहर जाता है। कविता उस वक्त जनम लेती है मनुष्य के भीतर का मन अपने ही सन्नाटे में अनसुनी धड़कन सुनना सीखने लगे ख़ुद से मुलाक़ातें करने लगे। रात के सबसे शांत पहर में जब शब्द थक कर चूर हों, कहीं एक पन्ना चुपके से खुलता है और मन अपने धीमे स्वर में कविता को पुकारता है। शायद इसी तरह जन्म लेती है कविता न उत्सव की भीड़ में, न तालियों की चमक मे...