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“हमसफ़र-ए-मैं”

“ हमसफ़र - ए - मैं ” ( स्वयं तक लौटने का शोकगीत )   दर्शनात्मक टिप्पणी ( कविता के संदर्भ में ) :   इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि मनुष्य अपने पूरे जीवन में अक्सर दुनिया , रिश्तों , उम्मीदों , विश्वासों और दूसरे लोगों में अपने होने का अर्थ खोजता रहता है। लेकिन समय के साथ उसे यह एहसास होता है कि सबसे बड़ी दूरी दुनिया से नहीं , बल्कि स्वयं से होती है। यह कविता उसी खोए हुए मनुष्य की यात्रा है , जो बहुत भटकने , टूटने , निराश होने और अकेलेपन से गुज़रने के बाद अंततः अपने ही भीतर लौटता है। अंततः “ हमसफ़र - ए - मैं ” केवल अकेलेपन का शोकगीत नहीं है , बल्कि स्वयं तक लौटने की एक शांत , गहरी और मानवीय यात्रा है।   मैंने बरसों तक हवाओं से पता अपना लिया , हर दिशा से लौटकर ख़ुद को सदा तनहा लिया।   भीड़ की आवाज़ में डूबा रहा दिन - रात मैं , और ख़ामोशी ने आकर नाम मेरा पा लिया।   धूप कंधों पर उतरती , शाम फि...