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“नज़्म: पत्थर का बुत”

  “नज़्म: पत्थर का बुत” “सत्तर बार मरी हुई एक जिन्दा लाश की दास्तान”   ( एक दबी हुई नब्ज़ की आवाज़ )   दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:   इस कविता के द्वारा कवि अपनी दबी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है की समाज अक्सर मर्द को सिर्फ एक मज़बूत इंसान के रूप में देखता है, लेकिन उसके अंदर छुपे दर्द, डर, टूटन और मानसिक संघर्ष को समझने की कोशिश नहीं करता। यह रचना केवल एक कविता नहीं, बल्कि उन करोड़ों खामोश चीखों का दस्तावेज़ है जिन्हें ‘मर्दानगी’ के झूठे किलों में कैद कर दिया गया है। यह महज़ अल्फ़ाज़ नहीं, उस सन्नाटे के मातम को आवाज़ देने की कोशिश हैं जिसे समाज अक्सर अनसुना कर देता है, जिसे हम ‘मर्द’ कहते हैं। “मर्द को दर्द नहीं होता” जैसी बातें सिर्फ एक सामाजिक बोझ हैं। इस रचना में इसके मिथक को केवल झुठलाया नहीं गया, बल्कि उस बोझ के नीचे दबे इंसान के ‘आंतरिक कब्रिस्तान’ का चित्रण किया गया है। इस कविता के ज़रिए कवि समाज से यह सवाल भी करता है कि अगर एक इंसान अपनी तकलीफ़ खुलकर कह भी न सके, तो क्या उसकी ख़ामोशी को समझने की ज़िम्मेदारी हमारी नहीं बनती ?     ह...