“नज़्म: पत्थर का बुत”
“नज़्म: पत्थर का बुत”
“सत्तर बार मरी हुई एक जिन्दा लाश की दास्तान”
( एक दबी हुई नब्ज़ की आवाज़ )
दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:
इस कविता के द्वारा कवि अपनी दबी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है की समाज अक्सर मर्द को सिर्फ एक मज़बूत इंसान के रूप में देखता है, लेकिन उसके अंदर छुपे दर्द, डर, टूटन और मानसिक संघर्ष को समझने की कोशिश नहीं करता। यह रचना केवल एक कविता नहीं, बल्कि उन करोड़ों खामोश चीखों का दस्तावेज़ है जिन्हें ‘मर्दानगी’ के झूठे किलों में कैद कर दिया गया है। यह महज़ अल्फ़ाज़ नहीं, उस सन्नाटे के मातम को आवाज़ देने की कोशिश हैं जिसे समाज अक्सर अनसुना कर देता है, जिसे हम ‘मर्द’ कहते हैं। “मर्द को दर्द नहीं होता” जैसी बातें सिर्फ एक सामाजिक बोझ हैं। इस रचना में इसके मिथक को केवल झुठलाया नहीं गया, बल्कि उस बोझ के नीचे दबे इंसान के ‘आंतरिक कब्रिस्तान’ का चित्रण किया गया है। इस कविता के ज़रिए कवि समाज से यह सवाल भी करता है कि अगर एक इंसान अपनी तकलीफ़ खुलकर कह भी न सके, तो क्या उसकी ख़ामोशी को समझने की ज़िम्मेदारी हमारी नहीं बनती ?
हर दर्द जो रातों को जगाए, वो दिल पे कहीं दर्ज नहीं होता।
जो ज़हर सरे-आम पिया जाए, वो लहू में नहीं मिलता।
ये जो तुम अक्सर कहते हो,
“मर्द को दर्द नहीं होता”
कभी उस शख़्स से पूछो
जो तन्हाई में खूब रोता।
ज़रा उस शख़्स के पास तो जाओ,
जो अंदर ही अंदर सदियों से,
एक लाश उठाए फिरता।
वह जुमला कोई कहावत नहीं
जो विरासत में मिला है उसे
कि आँसू बुज़दिली है
और खामोशी ताकत।
उस फ़रमान को उसने
रूह पर यूँ सजाया है
कि अब उसे खुद भी
अपने पत्थर होने का यक़ीन है।
वो मर्द,
जो दिन की रौशनी में
हौसलों का लिबास ओढ़े फिरता है,
ज़रूरत भर बोलता है,
हल्का-सा मुस्कुरा देता है,
और कुछ बातें
जाने-अनजाने टाल देता है।
मगर रात को,
जब कमरा अँधेरा होता है
और ख़ामोशी
उसके दिमाग़ से तेज़ बोलती है,
तब सच निर्वस्त्र होकर
सामने आ ही जाता है।
तब एक ऐसी जंग का आगाज़ होता है,
जो लड़ी तो जाती है,
मगर जीती नहीं जा सकती।
तब आईने में उसे
अपना चेहरा नहीं,
एक रिसता हुआ
ज़ख़्म दिखता है।
जाओ, उस मर्द से पूछो,
जिसके ज़ेहन में
हज़ारों अक्स है,
बे-हिसाब ख़यालों का
बेरहम सिलसिला
चलता रहता है।
जहाँ एक सोच
दूसरी को काटती है,
दूसरी का गला घोंटती है,
और वो अकेला
वजूद के दोराहे पर खड़ा
दम तोड़ता रहता है,
और अपना रास्ता
ढूँढता रह जाता है।
ये “क्या होता अगर” की दरारों में
रोज़ बिखर जाने की आदत है।
ये हर बात के सौ पहलू
तराशने की पुरानी बीमारी है।
उसके दिमाग़ में
जंग लग चुकी है,
पर वो लड़ता जा रहा है,
बे-मक़सद,
बस लड़ता जा रहा है।
वह शख़्स
दिन में चुप
रातों में टूटा,
और ख़्वाबों से
लहूलुहान रहता है।
वो जो रातों को सो नहीं पाता,
बस लेटा रहता है
आँखें मूँदकर,
फिर भी नींद नहीं उतरती उस पर।
उसके सपनों में कोई
चाँद नहीं आता,
बस कुछ “जख्मी मंज़र”
नज़र आते हैं
कई बरस पुराने,
खून से लथपथ।
वह करवट बदलता है,
जैसे इससे
यादें भी दिशा बदल लेंगी।
फिर भी, इससे
कोई फर्क नहीं पड़ता
तब वह चिल्लाना चाहता है,
पर आवाज़ उसके
अंदर ही फँस कर
एक गाँठ बन जाती है।
वह उठकर बैठ जाता है,
पानी पीकर उस कड़वाहट को
निगल जाता है
और आईने में देखकर
खुद से हर सुबह कहता है,
“कुछ नहीं,
बस एक बुरा सपना था।”
ये यादें उसे जीते-जी हर दिन जलाती हैं,
बताती हैं कि वो कभी ठीक नहीं हुआ।
उसकी नींद अब महज़ एक याद रह गई है,
और इसी बीच वो ख़ुद को खो चुका होता है।
वह मर्द,
जो दिन भर ठीक रहता है,
लोगों के बीच मौजूद रहकर
मुस्कुरा देता है,
लेकिन रात को
अपनी ही साँसों से
घबरा जाता है।
सोच के इस शोर में गुम,
ख़ुद से भी बेगाना रहता है।
वो मर्द
जिसकी “ज़ेहनी सेहत”
जिसे दुनिया वहम कहती है,
अब एक टूटा हुआ शीशा है,
जिसमें ख़ुद को देख कर
वो डर जाता है।
वह ख़ामोश बैठा है,
मगर जंग अब भी जारी है,
ये “एक्सट्रीम ओवरथिंकिंग” की लानत,
हर सोच पर भारी है।
होश तो तब उड़ता है
जब “पैनिक अटैक”
सीने पर बैठ कर पूछता है,
“आज किधर भागोगे ?”
और वो ठिठक जाता है,
क्योंकि वह जानता है,
भागना एक झूठ है,
और ठहरना एक धीमी मौत।
वो “डिप्रेशन” कोई सावन नहीं,
कि खिड़की से बैठकर देखें,
कोई बादलों की गड़गड़ाहट नहीं,
कोई तरंग नहीं, कोई फिल्मी दृश्य नहीं,
जिसमें बारिश हो और बंद कमरा,
और न ही कोई नम आँख है।
यह तो वह सूखा रेगिस्तान है,
जहाँ रोने की नमी भी
सूखकर खत्म हो चुकी है।
रोज़ शाम को
वह पाँच मिनट के लिए
बाथरूम में जाकर
दरवाज़ा बंद करता है।
वह शीशे में देखता है,
पानी का तेज़ नल खोल देता है,
ताकि अंदर की आवाज़,
उसकी अंदरूनी चीखें,
बाहर किसी को सुनाई न दे।
शीशे में देखता है,
अपना चेहरा ढूँढता है,
और खुद से पूछता है,
“तू आख़िर है कौन ?”
मगर बहता हुआ पानी
उसके जेहन के शोर को
तो छुपा लेता है,
पर उस सवाल का
जवाब नहीं दे पाता।
वो आदमी पानी ढूँढता है,
अपनी ही आँखों के सूखे कुएँ में,
पर वहाँ तो सिर्फ़ थकी रातें हैं
और एक शीशा जो उसे
बिना चेहरे के दिखाता है।
वो “पैनिक के झटके”,
वो साँसों का उखड़ जाना,
आसान नहीं है,
ख़ुद को जीते-जी भूल जाना।
कभी बेनाम “डिप्रेशन” की
गहरी गुफ़ा-सा हर लम्हा,
जैसे दिल को याद आ गया हो कुछ
जो दिमाग़ कभी भूलना चाहता।
कभी बेवजह दिल तेज़ धड़कता है,
हाथ कांपते हुए ठंडे पड़ जाते हैं,
और वह समझ नहीं पाता,
कि यह डर है,
या बस
उसकी रूह थक चुकी है।
लोग कहते हैं
“मज़बूत बनो,
आँसू को क़ैद रखो,”
पर कोई यह नहीं पूछता
कि सीने में उठते
उस गुबार का क्या करें?
उसने किसी को बिना बताए,
खुद को संभाले रखा है।
वो अपनों के बीच रहकर भी
सबसे बड़ा अजनबी है।
उसके कुछ दोस्त हैं,
अच्छे दोस्त।
पर अल्फ़ाज़ नहीं।
क्योंकि दोस्तों की भीड़ में भी,
बात अधूरी ही रह गई।
क्योंकि जब महफ़िल जमती हैं,
तब बातें बहार की होती हैं
जैसे क्रिकेट, सियासत, शेयर बाज़ार।
वह सुनता है,
हाँ में सिर हिलाता है
और सोचता है,
“अगर आज मैं कह दूँ
कि मैं हर रात मरता हूँ,
तो उनका जवाब क्या होगा ?”
तो क्या ये हँसते हुए चेहरे
मुझे “बेचारा” नहीं कहेंगे?
क्या ये कंधा देंगे,
या “मर्द बनो” का मशवरा?
या फिर समझेंगे ही नहीं।
उसके पास घर है,
घर में भी उसे समझा न गया,
जिसके माँ-बाप उसकी आँखों की
वीरानी नहीं पढ़ पाए,
जिसने उसे गुमसुम तो कह दिया,
मगर उसके दिल का
मातम नहीं देख पाए ।
वह कहते हैं,
“बस थोड़ा खुश रहा कर।”
जैसे ख़ुशी किसी सब्ज़ी की दुकान से
मिलने वाली चीज़ हो।
उसकी ख़ामोशी को
ज़िद कहा, दर्द नहीं,
मगर किसी ने न जाना कि
उसके दिल पर क्या गुज़र रही है।
घर में उसकी चुप्पी को
आदत समझ लिया गया है।
माँ कहती है,
“थोड़ा बाहर निकला कर।”
बाप कहता हैं,
“ज़िंदगी में दिक्कतें आती रहती हैं,
तू हिम्मत न हार।”
वह सिर हिलाता है।
माँ की दुआएँ और बाप की नसीहतें,
दरारों के ऊपर रंग जैसी हैं,
वो मुस्कुरा देता है,
क्योंकि अब समझाने में जितना दर्द है,
समझ न आने में उससे भी ज़्यादा।
क्योंकि समझाना और समझ न आना
के बीच का फासला
अब बहुत लंबा हो चुका है।
इतना लम्बा कि वह
नापते-नापते थक गया है।
वो जो कल तलक
ख़ुदा की चौखट का
मुसाफिर हुआ करता था,
सजदे में सर झुकाता था,
हर दुआ में रब का
शुक्र मनाता था।
मगर अब उसका हाथ
जुड़ने से पहले ही रुक जाता है,
क्योंकि उसका ख़ुदा से
भरोसा ही उठ चुका है।
आजकल वह सवालों में घिरा रहता है,
क्योंकि जब उसे सबसे ज्यादा ज़रूरत थी,
तब आसमान भी खामोश रहा,
कोई जवाब न मिला,
तब किसी खुदा ने
उसका साथ न दिया।
इसी वजह से वह
टूट के बिखर गया,
और उसका यक़ीन
चूर-चूर हो गया।
वो जो “इंट्रोवर्ट” है,
जो महफ़िल में बैठता है,
मगर अपनी बातें
सीने की दीवारों में क़ैद रखता है।
जिसके मज़बूत जिस्म में
रूह सफ़ेद पड़ चुकी है।
जिसे अब अपनी ही आवाज़ से
चिढ़ होने लगी है।
जो अब या तो मौत माँगता है,
या कोई गहरी लंबी नींद।
वो अब शिकायत नहीं करता,
न खुद से, न अपनों से,
न तक़दीर से, न ही ख़ुदा से।
उसने अपनी हस्ती
बाँध ली है सब्र की ज़ंजीर से।
वह किसी पर
बोझ नहीं बनना चाहता।
यही उसका आख़िरी घमंड है,
या आख़िरी कमजोरी,
वह खुद भी नहीं जानता।
बस कभी-कभी बेवजह
बहुत देर तक एक जगह
बैठा रहता है,
और समय थोड़ा और
भारी हो जाता है।
वह अपनी ही हस्ती से खफा है,
उसे अब जीने की
कोई आस नहीं रही,
उसे अब मौत डराती नहीं,
बल्कि एक लंबी नींद की तरह लुभाती है।
वह हर रोज़ अपने वजूद का जनाज़ा उठाता है,
मुस्कराता है, घर का सामान लाता है,
और बिस्तर पर लेटकर दीवारों को ताकता है।
उसका कमरा
धीरे-धीरे एक मक़बरा बन गया है
जहाँ हर रात एक इंसान दफ़्न होता है,
और हर सुबह एक “पत्थर का बुत” जागता है।
कभी-कभी उसके दिमागी ख़यालात की
दीवारों पर मौत दस्तक देती है,
आहिस्ता,
मगर लगातार।
“बस एक कदम और फिर …”
ख़याल आता है, खत्म करने का,
मिट जाने का, कोई शोर नहीं होने का।
वो उस किनारे तक जाता है
रात-रात भर, पर फिर लौट आता है,
इसलिए नहीं कि उम्मीद है,
बल्कि इसलिए कि आदत है।
क्योंकि उसके लिए अब ज़िंदा रहना भी यहां,
बस एक बहाना है, अपने बूढ़े माँ-बाप के भ्रम के लिए।
अब उसे ख़ुदकुशी के ख़्वाब मीठे लगने लगते हैं
और जीने के सब मक़सद व्यर्थ लगने लगते हैं।
फिर भी वो जीता है हर रोज़,
थोड़ा-थोड़ा मरकर।
अपने लिए नहीं,
बस उन लोगों के लिए
जो उससे जुड़े हैं।
क्योंकि मरना भी उसे
आसान नहीं लगता।
वो रोज़ मरता है,
रोज़ जीता है,
सुबह उठता है,
चेहरा धोता है,
हँसता है,
काम करता है,
सामान ख़रीदता है
लेकिन कोई नहीं देखता
कि उसकी आँखों में
एक पूरा
आंतरिक कब्रिस्तान
खामोश पड़ा है।
वह दुनिया को
वही पुराना झूठ दे देता है,
“मर्द को दर्द नहीं होता ”
शायद इसलिए नहीं
कि यह सच है,
बल्कि इसलिए
कि कुछ दर्द
कह देने से भी
कम नहीं होते।
जबकि हक़ीक़त ये है,
मर्द को दर्द होता है,
इतना गहरा कि आवाज़ भी
वहाँ तक नहीं पहुँचती।
जाओ और पूछो उस मर्द से,
जिसे तुम “पत्थर” समझते हो,
वो अंदर से कितना टूटा है।
वो किस आग में जलता है?
वो जो रो नहीं सकता,
क्योंकि दुनिया देखेगी,
वो जो बोल नहीं सकता,
क्योंकि कोई समझेगा नहीं।
वो अंदर मर तो जाता है,
मगर ज़ाहिर नहीं करता।
और इसीलिए वो जीता है
ख़ामोशी में,
और मरता है
बिना आवाज़ के।
किसी रोज़ पूछना उससे,
जो ख़ामोशी को ओढ़े फिरता है,
कहीं ऐसा न हो कि जवाब में
वो सिर्फ़ मुस्कुरा दे,
क्योंकि वो पहले ही
भीतर से मर चुका हो।
तड़प ये है कि वो अपना तमाशा कर नहीं सकता,
तमाम उम्र का ये बोझ अब उठा नहीं सकता।
वो हर रात अपनी ही मय्यत को कंधा देता है,
क्योंकि सबके सामने वह खुलकर मर भी नहीं सकता।
सहन करता है वो कोड़े, पुरानी रीत के “हार्दिक”,
कि वो सब कुछ है दुनिया में, मगर एक इंसान हो नहीं सकता।
हर शख़्स यहाँ अपनी ही हस्ती में छुपा है,
एक शहर है अंदर, जो ज़माने से कटा है।
ये कैसा दर्द है जो कहा नहीं जाता,
वरना हर ज़ख़्म की एक ही तो ज़बाँ है।
जाओ उस शख्स से पूछो,
जो अंदर से बिखर चुका है,
जो ज़िंदा तो है,
मगर अंदर से
“ सत्तर बार मर चुका ” है।
– हार्दिक जैन। ©
इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।
कठिन शब्दों के अर्थ - (कविता के सन्दर्भ में)
1. बुत - मूर्ति।
2. मिथक - झूठी सामाजिक मान्यता या भ्रम।
3. आंतरिक - भीतर का।
4. जुमला - कहावत।
5. बुज़दिली - कायरता।
6. फ़रमान - आदेश।
7. आगाज़ - शुरुआत।
8. रिसता - धीरे-धीरे बहता हुआ।
9. ज़ेहन - मन / दिमाग़।
10. अक्स - परछाईं / छवि।
11. लहूलुहान - बुरी तरह घायल।
12. मंज़र - दृश्य।
13. ज़ेहनी सेहत - मानसिक स्वास्थ्य।
14. एक्सट्रीम ओवरथिंकिंग - हर बात को ज़रूरत से ज़्यादा और लगातार सोचना।
15. लानत - अभिशाप।
16. पैनिक अटैक - तीव्र मानसिक घबराहट का दौरा।
17. ठिठक - अचानक रुक जाना / सहम जाना।
18. डिप्रेशन - गहरी मानसिक उदासी।
19. तरंग - लहर।
20. गुबार - मन में जमा घुटन / दबा हुआ दर्द / बेचैनी।
21. मशवरा - सलाह।
22. वीरानी - सूना-पन / उदासी से भरी ख़ामोशी।
23. नसीहतें - सीख।
24. इंट्रोवर्ट - अंतर्मुखी।
25. मक़बरा - क़ब्र / समाधि जैसी जगह।
26. ज़ाहिर - प्रकट करना।
27. मय्यत - जनाज़ा।
28. कोड़े - समाज की कठोर परंपराओं और तानों का प्रतीक।
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