“अश्क़ों की रूहानी दास्तान”
“अश्क़ों की रूहानी दास्तान”
— एक ऐसी दास्तान जो अल्फ़ाज़ में नहीं,
आहों में लिखी गई —
दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:
इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि इंसान का सबसे गहरा दर्द अक्सर ख़ामोशी में पनपता है, और जब शब्द कम पड़ जाते हैं, तब आँसू ही उसकी असली भाषा बन जाते हैं। यह कविता दिखाती है कि लिखना दूसरों को प्रभावित करने का ज़रिया नहीं, बल्कि अपनी ही रूह को सँभालने और तसल्ली देने की एक कोशिश है—जहाँ हर लफ़्ज़ एक ज़ख़्म, और हर मिसरा एक मरहम बन जाता है। यह रचना उस अनकहे सच को आवाज़ देती है कि दर्द का सफ़र कभी ख़त्म नहीं होता, वह बस रूप बदलकर यादों और शब्दों में बस जाता है।
मेरी ख़ामोश सांसों के उजड़े मक़ाम पर,
एक बे-नक़ाब दर्द हर रात फ़रियाद करता है।
ज़िंदगी की राहों में बिखरे हुए लम्हों की तरह,
मेरा हर अश्क़ भी चुप रहकर इज़हार करता है।
जो दुख सीने में है, हर रोज़ उसे सहता हूँ,
लफ़्ज़ों में ढलकर ही मैं ख़ुद को बयाँ करता हूँ।
लोगों को मामूली लगे, मेरे फ़साने मगर,
मैं हर पंक्ति में रूह का ज़ख़्म तराशता हूँ।
ख़ामोशी की चौखट पर बैठा रहता हूँ,
दिल की दास्ताँ ख़ुद ही बहती जाती है।
जो भी अल्फ़ाज़ लिखे, अश्क़ों में भीगे हुए,
हर मिसरा मेरी तन्हाई का पता बताती है।
लोग कहते हैं —
“कम लफ़्ज़ हों तो असर ज़्यादा होता है।”
पर क्या करें,
मेरी रूह का बोझ इतना गहरा है,
कि हर दर्द ख़ुद-ब-ख़ुद दास्ताँ बन जाता है।
हर सफ़्हा जो मैं लिखता हूँ,
वो मेरा साया-ए-ग़म बनकर चलता है।
मेरी तहरीरें सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं —
ये तो जख़्मों की धूल हैं,
जो वक़्त की बेरहम हवा में उड़ती रहती हैं।
हसरतें, तन्हाइयाँ, नादान उम्मीदें,
सब मेरी गर्दिश में साथ निभाती हैं।
हर रात सीने में एक खालीपन उठता है,
जो ख़ामोशी में भी मेरा नाम पुकारता है।
काग़ज़ पर गिरते अश्क़ स्याही नहीं होते,
ये अधूरी दुआओँ की लकीरें होते हैं।
हर हर्फ़ में एक टूटता हुआ फ़साना है,
हर मिसरे में मेरी ख़ामोश पीड़ा बोलती है।
मेरी कलम की रफ़्तार तेज़ ही सही,
पर दर्द लफ़्ज़ों से भी गहरा रहता है।
हर पन्ना आईने की तरह,
मेरी तन्हाई का चेहरा दिखाता है।
वक़्त…
एक ख़ामोश क़ातिल की तरह चलता है —
मेरी यादों के जिस्म से रंग चुराता है।
कुछ यादें मगर यूँ ही रहती हैं —
जो मिटती नहीं,
बस धीमी चुभन बनकर दिल में उतर जाती हैं।
वक़्त की नर्म चुप्पी में,
मेरे जज़्बात सदा गुम हो जाती है।
हकीकत की खामोशी में,
मेरी रूह कभी रोती, कभी मुस्काती है।
तन्हाई की रातों में जब साँसें भी बोझ बन जाती हैं,
मैं अपने ही साये से पूछ लेता हूँ —
“क्या दर्द का सफ़र कभी पूरा होता है ?”
मगर साया हँसकर कह देता है —
“ग़म वो महरम है जो कभी जुदा नहीं होता है।”
यादों की परछाइयाँ मेरे साथ ही चलती हैं,
हर मोड़ पर जाकर मुझे पहचानती हैं।
बीते कल की मुस्कान, आज के आँसू —
मिलकर मेरी ज़िंदगी का सफ़ा बनाती हैं।
जो कुछ मैं लिख नहीं पाता,
वो अंदर बेसुरा मातम बनकर गूँजता है।
इसीलिए कलम उठाता हूँ —
अपनी रूह को तसल्ल़ी देने के लिए,
ना कि दुनिया को अहसास करवाने के लिए।
मेरी लेखनी सिर्फ़ मेरे लिए है,
ना कि किसी को प्रभावित करने के लिए।
जो मैं कह न सका,
उसी को अपने अल्फ़ाज़ में जीता जाता हूँ।
मैं लिखता हूँ दिल की गहराइयों से —
जहाँ शब्द नहीं पहुँचते, वहाँ रूह बोलती है।
ये अश्क़, ये दर्द, ये टूटे हुए ख्वाब,
सिर्फ़ काग़ज़ पर उतरकर ही सुकून पाते हैं।
मैं लिखता हूँ क्योंकि —
साँसें जब कम पड़ जाती हैं,
दर्द लफ़्ज़ों में ढलकर हल्का हो जाता है।
जैसे कोई दरवेश रेत पर नाम लिखकर
अपनी तन्हाई का बोझ उतारता जाता है।
कहानियाँ छोटी हो सकती हैं?
शायद, पर मेरे जज़्बात अनंत हैं।
अश्क़ों की गहराई, यादों की मिठास,
मेरे शब्दों में हमेशा ज़िंदा रहती है।
यादें दिल के बाग़ में अब भी महकती हैं,
अश्क़ों की नमी मिट्टी में बसती जाती है।
दर्द का सिलसिला थमता नहीं कभी —
मगर उसकी ख़ूबसूरती, उसकी सच्चाई,
जीने की वजह बन ही जाती है।
अंजाम यही है —
ग़म मेरी रूह में घर कर जाता है,
यादें मेरी विरासत बन जाती हैं।
ये दर्द मिटता नहीं —
बस ख़ूबसूरत होकर,
हमेशा के लिए ठहर जाता है।
फिर भी इस वीराने में एक रौशनी है —
जो कहती है कि हर दर्द अपनी मंज़िल पाता है।
मैं लिखता रहूँगा, क्योंकि लिखना ही मेरी मुक्ति है,
और शायद किसी दिन, किसी मोड़ पर
मेरी क़लम मुझे मुझसे कम उदास बना दे।
“ऐ हार्दिक” —
“कहानी को छोटा करना लोगों का हुनर होगा,
हम तो दर्द को लिखते हैं —
जो जितना गहरा होता है,
उतना ही लंबा लिखा जाता है।”
यह साधारण पढ़ने वालों के लिए नहीं —
यह उन दिलों के लिए है जो समझते हैं कि
ख़ामोशी भी बोलती है,
और कभी-कभी चीख़ उठती है।
– हार्दिक जैन। ©
इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।
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