“माँ — एक अनकही दुआ”

“माँ — एक अनकही दुआ”

“ममता की मूरत: एक ख़ामोश इबादत”

 

दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:

 

इस कविता के मूल भाव को समझने के लिए हमें एक बेटे के मन की गहराइयों में झाँकना होगा। हम सब अपनी माँ से बहुत प्यार करते हैं। हम उनके लिए कविताएँ लिखते हैं, उनकी तारीफ करते हैं, उन्हें देवी जैसा दर्जा देते हैं। लेकिन क्या हम सच में उन्हें समझ पाते हैं? यह कविता इसी सवाल से जन्मी है। यह कविता एक बेटे की दिल से निकली हुई उसी एहसास की यात्रा है — नासमझी से समझ तक, और समझ से कृतज्ञता तक। यह माँ के प्रेम और प्रशंसा से कहीं बढ़कर, माँ के प्रति एक आत्म-साक्षात्कार है। कवि उन एहसास को शब्द देता है जो हम अक्सर महसूस तो करते हैं, पर कह नहीं पाते। इस कविता की भावनात्मक स्थिति — कृतज्ञता, पश्चाताप, और जागृति — तीनों का मिश्रण है।

 

 

माँ महज़ एक नाम नहीं,

मेरे वजूद की पहली आहट हैं।

जब दुनिया मुझसे बे-ख़बर थी,

आप अपनी धड़कनों में बसाए बैठी थी।

 

झुर्रियों भरे वे हाथ,

जो अब हल्के-से काँपते हैं,

कभी फौलादी दीवार थे;

कभी मेरी वह ढाल थे।

 

आपके हाथों की

लकीरों में आज भी,

मेरे बचपन की शरारतें और

अनगिनत दुआएँ आबाद हैं।

 

आपकी हथेलियों की महक सोंधी-सी,

जो रूह को सुकून दे,

हर बे-चैन दिल के दर्द की

सबसे मुकम्मल दवा हैं।

 

आपके हाथों में बसी वो गरमाहट,
जो बचपन की सर्द रातों को ढक लेती थी।

वो उँगलियाँ,

जो थामकर चलना सिखाती थीं,

आज भी मेरी ठोकरों से पहले

दुआ बनकर बिछ जाती हैं।

 

माँ !

आपने कभी अपने दर्द का

ज़िक्र नहीं किया,

बस मेरी हर ख़ुशी में

अपना जहाँ ढूँढ लिया।

 

आपकी जागी हुई रातों का हिसाब
कभी अल्फ़ाज़ में नहीं आया।

पर आँखों के नीचे के वे हल्के घेरे,

मेरे सुकून की गवाही देते रहे।

 

मेरी एक हल्की-सी सिसकी पर,

आपका सारा जहाँ ठहर जाता था,

जैसे पूरी कायनात की ममता

सिमट आई हो आपके आँचल में।

 

रातों की नींदे आपने

यूँ ही मुफ़्त में नहीं खोई थी,

मेरी हर करवट पर,

ख्वाबों को सींचा

और अपनी हसरतें पिरोई थीं,

आप रात भर जागती थी

मेरी नींद के लिए,

और हर सुबह

मेरे चेहरे पर उगती मुस्कान —
आपकी ही मेहनत थी।

 

आप नींव की ईंट रही,

दबी रही कि मैं मीनार बनूँ,

आप हाशिये पर खड़ी रही,

ताकि मैं ज़माने का अख़बार बनूँ।

 

आपकी चुप्पी में छुपी थीं

हज़ार दुआएँ,
आपके आँचल में बसे थे

अनगिनत ख़्वाब।

 

आपकी आँखों में

एक अजीब-सी

रोशनी थी,

जैसे कोई चिराग़

जो आँधियों से

लड़कर भी हो आबाद।

 

आपके त्याग की वो दास्ताँ,

बिना अल्फाजों के,
बालों के सफेद धागों

में बुनकर रखी।
मैंने जो भी सीखा,

आपकी उँगलियों से सीखा,
हर कदम पर आपने दिया सहारा,

बिना हिसाब के।

 

आपके ज़बान पर

शिकायत का

एक लफ़्ज़ भी

नहीं आया,

आप चुप रही,

जब ज़माने ने आपकी

हसरतों को हाशिए पर धकेला।

 

लोग कहते हैं

कि खुदा ऊपर है,

पर मैं नास्तिक हूँ —

मैं उसके अस्तित्व को

नकारता रहा,

जब तक मुझे

यह एहसास हुआ कि,

अगर जन्नत कहीं है,
तो वो किसी

आसमान में नहीं —
वो साक्षात आपके

क़दमों की धूल में है।

 

और अगर खुदा कहीं है,
तो वो किसी मंदिर या मस्जिद में नहीं —
वो आपकी आँखों की उस नूर में है,
जो मेरे लिए हर रोज़ जलती है।

 

आपके कंधों पर सवार होकर,

मैंने दुनिया देखी,
आपकी गोद में छिपकर,

डर को हरा दिया।

आप पीछे चलती रही हमेशा,
और मैं आगे होने का

गुरूर करता रहा।

 

आपकी ममता का व्याकरण,

शब्दों का मोहताज नहीं,

आप वह आयत हो,

जिसे पढ़ने के लिए

सिर्फ दिल चाहिए,

और कुछ नहीं।

 

आपकी ताक़त शोर नहीं मचाती,

वह तो दबे पाँव आती है —

जैसे कड़कती धूप में

बरगद की ठंडी छाँव,

या जैसे सहरा में

ठंडी हवा का एक झोंका।

 

आपने मुझे चलना सिखाया,
गिरकर भी सँभलना सिखाया,

मगर आप थककर बैठती
कभी नज़र नहीं आई।

 

आपका प्यार किसी

सौदे का मोहताज नहीं,

यह तो बस एक दरिया है,

जो खामोशी से बहता रहता है।

 

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,

तो समझ आता है कि

मैं जो कुछ भी हूँ,

आपकी खामोश इबादत का नतीजा हूँ।

 

मेरे हिस्से की कामयाबी

आपके चेहरे पर नूर बनकर खिलती है,

और मेरी नाकामियों को

आप अपने आँचल में छुपा लेती हो।

 

मुझे याद है —

जब मैं गिरता था,

आप पहले मुझे नहीं,

मेरे डर को उठाती थीं,

और कहती थीं —

“डर मत, मैं हूँ ना।”

 

वो “मैं हूँ ना”

आज भी मेरे हर अँधेरे में

एक उजाला बनकर उतरता है।

 

आपकी हथेलियों की लकीरों ने

मेरी तक़दीर लिखी थी,

और आपने अपनी हर ख़्वाहिश
मेरे नाम लिख दी।

 

कभी बीमारी की आग में जलता था मैं,
आपका माथे का स्पर्श ठंडक बन जाता।
दवा से पहले आपकी दुआएँ काम आतीं,
वो आँसू जो आप छिपाती थी,

मेरे सीने में घर कर जाते।

 

माँ !

मैंने आपको एक औरत के रूप में नहीं,
हमेशा एक माँ के सांचे में ढालकर ही देखा है,
और यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी।


आपके भी कोई सपने रहे होंगे
जो आपने मेरी नींद के लिए कुर्बान कर दिए।
आपका भी कोई गीत रहा होगा
जो आपने कभी गुनगुनाया ही नहीं।


रसोई की भाप में
आप ख़ुद को खोती रही,
और मैंने कभी पूछा ही नहीं,
कि आपको क्या पसंद है।

 

कभी सोचा नहीं मैंने,

कि जो खाना मैं खाता था,

उसमें आपकी भूख भी शामिल थी,

जो कपड़े मैं पहनता था,

उनमें आपकी अधूरी ख्वाहिशें भी थीं।

 

आप चुपचाप

अपने हिस्से की दुनिया

मुझे देती रही,

और मैं

उसे अपना हक़

समझता रहा।

 

आपने अपनी कहानी का

मुझे नायक बना दिया,

और अपनी दास्ताँ को ताउम्र

अप्रकाशित रहने दिया।

 

माँ !

आपने मुझे सिर्फ़

जन्म नहीं दिया,

आपने मुझे

हर रोज़

नया बनाया है —

अपने सब्र से,

अपने यक़ीन से,

अपने बे-शर्त मोहब्बत से।

 

जब भी मैं खुद से

हारने लगता हूँ,

आपकी आवाज़

मेरे भीतर गूंजती है,

जैसे कोई पुराना गीत,

जो कभी पुराना नहीं होता।

 

माँ !
आप वो किताब हो
जिसे मैंने कभी

ठीक से पढ़ा ही नहीं,
बस उसके सहारे
इम्तिहान पास करता रहा।

 

आज जब ज़िंदगी

सवाल पूछती है,
तो जवाब ढूँढने
फिर उसी किताब के

पन्नों में लौटता हूँ,
जहाँ हर सफ़ा
आपके नाम से

शुरू होता है।

 

आप खुदा का नूर है,

या खुद खुदा है,

ये कह पाना मुश्किल है।

 

बस इतना जानता हूँ कि

आपके कदमों तले

मेरी जन्नत का

हर रंग शामिल है।

 

आज समझ आया —

दुनिया की सबसे बड़ी दौलत

न नाम है, न शोहरत —

बस एक माँ का होना है।

 

माँ !

यह एहसास कभी नहीं मिटेगा;

आपका एहसान कभी न भूलूंगा,
आपके साथ,

ये अनमोल बंधन,

जीवन-भर रहेगा।


आप हो, तो सब है,

आपका प्यार अमर है,
मेरी हर साँस में आप बसी हो,

माँ, आप ही मेरी सब कुछ हो।

 

आज,

इस ख़ामोश क़लम से

बस इतना कहना चाहता हूँ —

 

माँ !

“आपका होना ही

मेरी ज़िंदगी की

सबसे ख़ूबसूरत

सच्चाई है। ”

 

आज मैं आपके

हाथ की लकीरें नहीं,

हथेली की गरमाहट को

पढ़ना चाहता हूँ।
वो गरमाहट जिसने

चूल्हे की आँच सही,
जिसने कपड़े धोते पानी की

सर्द भोगी,
जिसने मेरे बुखार की रातों में
मेरे माथे से चिपके बाल सँवारे।

 

आप वो शमा हो जिसने जलना सीखा,
पर कभी जलाना नहीं।
आप वो दरिया हो जिसने बहना सीखा,
पर कभी उफनना नहीं।
आप वो ज़मीन हो जिसने उपजना सीखा,
पर कभी माँगना नहीं।

 

आज बाज़ार सजे हैं,

‘मदर्स डे’ के कार्ड बिक रहे हैं,

फूलों की नुमाइश है,

लोग स्टेटस लगाकर

अपना फर्ज निभा रहे हैं।

 

पर माँ, मैं आपको

किसी एक दिन में कैसे समेटूँ?

आप तो मेरा हर दिन हो,

मेरी हर साँस का हिस्सा हो।

 

मैं आपको कोई तोहफा

नहीं दे सकता।

क्योंकि आपको तोहफा देना

सूरज को दीया

दिखाने जैसा है,

क्योंकि जिस अस्तित्व का हर कतरा

आपकी उधार दी हुई सांसों से बुना गया हो,

यह शरीर, यह नाम, यह पहचान —

सब आपकी ही तो दी हुई जागीर है,

वह आपको वापस क्या ही लौटाएगा?

 

और अंत में —

 

अगर कभी शब्द साथ छोड़ दें,
अगर कभी आवाज़ भी थम जाए,
तो मेरी ख़ामोशी को सुन लेना —

 

उसमें भी
आपका ही नाम गूँजेगा।

 

क्योंकि
मेरे होने की

शुरुआत भी आप हो,
और अर्थ भी।

 

माँ !

आप मेरी सिर्फ़ जन्मदाता नहीं,

आप मेरे लिए ईश्वर का

सबसे सुंदर अहसास हो।

आपकी खामोशी मेरा

सबसे बड़ा सबक है,

और आपका आँचल,

मेरी कायनात का

सबसे सुरक्षित कोना।

 

यही मेरी कविता का अंतिम शब्द है —
न तारीफ़, न एहसान,
बस एक बेटे का ये अहसास
कि माँ को समझने के लिए
उसे माँ से ऊपर

उठकर देखना पड़ता है।

 

और आज,
शायद,
मैं पहली बार
सही मायने में
आपको देख पा रहा हूँ।

 

माँ !
आप इबादत भी हो,
आदत भी,
ज़रूरत भी,

और पूरी

कायनात भी हो।

 

और सच कहूँ तो,

मेरे अंधेरे जीवन में

आप ही मुकम्मल

चिराग़-ए-हयात हो।

 

– हार्दिक जैन। ©
  इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।

 

 

कठिन शब्दों के अर्थ - (कविता के सन्दर्भ में)

 

1. कृतज्ञता - आभार / धन्यवाद का भाव।

2. आत्म-साक्षात्कार - खुद को सच में समझना।

3. आबाद - बसा हुआ / जीवित।

4. सोंधी-सी - हल्की और सुकून देने वाली।

5. सिसकी - हल्की रोने की आवाज़।

6. सींचा - देखभाल।

7. हसरतें - अधूरी इच्छाएँ।

8. हाशिये - किनारा / पीछे रह जाना।

9. नूर - चमक / रोशनी।

10. आयत - पवित्र पंक्ति / संदेश।

11. सहरा - रेगिस्तान।

12. नायक - कहानी का मुख्य पात्र।

13. शमा - दीपक / मोमबत्ती।

14. नुमाइश - दिखावा / प्रदर्शन।

15. जागीर – संपत्ति / अधिकार।

16. चिराग़-ए-हयात - जीवन का दीपक।


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