“ नज़्म-ए-मर्ग ”

“ नज़्म-ए-मर्ग ”

“जन्मदिन पर मृत्यु कामना”

 

( — एक सफर, एक ख्वाब — जिसका अंत मैं चाहता हूँ अपने जन्मदिन पर — )


 

दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:

 

ज़िंदगी हर किसी के लिए खुशी का कारण नहीं होती। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके लिए वही दिन जो दुनिया के लिए सबसे ख़ास होता है, यानी जन्मदिन — उनके अंदर सबसे गहरा दर्द जगा देता है। यह कविता एक ऐसे इंसान के मन की आवाज़ है जो बाहर से सामान्य दिखता है, लेकिन भीतर से बहुत पहले ही थककर टूट चुका है, और अब बस एक सुकून भरा अंत चाहता है — उसी दिन, जिस दिन उसकी शुरुआत हुई थी। यह कविता किसी को दुखी करने के लिए नहीं लिखी गई है। इसको लिखने के पीछे सबसे बड़ी सोच यह है कि जन्मदिन जैसा दिन, जो दुनिया के लिए उत्सव है, वही किसी के लिए मौत की याद कैसे बन सकता है। जब इंसान के अंदर का जीवन खत्म हो जाता है, तो बाहर का जीवन सिर्फ एक तस्वीर बनकर रह जाता है। यह कविता उसी दरार की कहानी है, जो दिख रहा है और महसूस हो रहा है, उसके बीच की खामोश दूरी की।

 

 

आज फिर लौटकर वह तारीख़ आई है,

ज़िंदगी ने जहाँ पहली अंगड़ाई ली थी।

मगर अब दिल की बस एक ही आरजू है,

कि आख़िरी साँस भी इसी मोड़ पर ठहर जाए।

 

एक ख़ामोशी है दिल में ऐसी —
जहाँ जश्न के भीतर
ग़म का सौदा पलता है,
कोनों में डूबा ख़ौफ़
बिना आवाज़ के जलता है।

 

बचपन की मोमबत्तियाँ —
अब आग-सी चुभती हैं,
उनकी रौशनी
अब धीरे-धीरे
अँधेरों में ढलती है।

 

‘जन्मदिन मुबारक’ —

आवाज़ें गूंजती हैं चारों ओर,

मुख पर हँसी सजाते हैं,

पर भीतर रोती रूह को
कौन यहाँ पहचानते हैं?

कौन खामोश चीख़ों का

मतलब समझ पाते है?

मैं भी हँसता हूँ चुपके से,
आँसू भीतर पी जाता हूँ,
हर साल इसी तारीख़ पर
‘अंत’ स्वयं लिख जाता हूँ।

 

मैं सोचता हूँ —
मुबारक कहूँ भी

तो आखिर किसे कहूँ?

 

उस बच्चे को

जो यादों के पीछे

कहीं छूट गया?
या इस साये को
जो बस तारीखें

मुकम्मल करता है,

और हर साल

अपने ही वजूद का

कफन बुनता है?

 

सब कहते हैं —

‘मुस्कुरा ज़रा !’
‘आज तो ख़ुशियाँ मना ले तू।’
पर कैसे कह दूँ सच ये —
मैं इस दिन से डरता हूँ।

 

जब दुनिया दुआएँ देती है,

जश्न के नग़मे सुनाती है,
मैं हिसाब ही करता हूँ —
कितनी साँसें शेष बचीं है,
बस यही गणित धरता हूँ।

 

केक पर जलती मोमबत्तियाँ,
मन में बुझती आशाएँ हैं,
रौशनी के इस उत्सव में
सिर्फ़ अंधेरे साये हैं।

दोनों एक साथ घटती हैं,
बिना किसी ऐलान के।

एक ख़ामोशी है —

न पूरी, न खाली,
बस जैसे कोई अधूरी ग़ज़ल

मक़्ते की मुंतज़िर में हो।

क्या यही होगा — ए ज़िंदगी !

तेरी तरफ़ से

मेरा सबसे ख़ास,

सबसे कड़वा तोहफ़ा?

 

हर वर्ष यही तमाशा दोहराता है —
बाहर जश्न बढ़ता है,
और भीतर
सन्नाटा चुपचाप

अपनी जड़ें
ओर गहरी करता है।

 

हर बार यही प्रश्न उठे —
‘कब थमेगा ये दर्द ?’
जीवन बोझिल-सा बना,
और साँसें लगती जैसे दंड।

 

हर साल यह तारीख लौटकर आती,
हँसता चेहरा संग लाती।
पर दिल अंदर से रोता है —
रात से अब अनजानी नफ़रत-सी होती ।

 

अब ख़्वाहिशें क्षीण हुईं —
ना कोई बड़ा सवाल,
न ही कोई शिकायत —
बस एक थकान शेष रही,
जो हर जन्मदिन
थोड़ी और साफ़ दिखाई देती है।

 

क्या दूं मैं खुद को कोई उपहार?

एक आईना जिसमें मैं अपनी टूटी सोच देखूं?

या एक खाली डायरी जिसमें हर पन्ने पर लिखूं —

‘मुझसे न हो पाया ये जीवन का सफर।’

 

न चाह मुझे उपहारों की अब,
न शुभकामनाओं का भार,

बस एक शांत सी मिट्टी की चादर

हो ज़मीन पर मेरा आख़िरी संसार,

जिसमें मुझे मिले सुकून का विस्तार।
जहाँ मेरा सारा जहाँ समा जाए,
और ये दर्द भी थक कर सो जाए।

 

आँखों में आँसुओं का समंदर है
पर दिखाता नहीं —

यह मेरे अंदर का जला हुआ शहर है,
जो भीतर ही बसता है।


मुस्कान ज़बाँ पर,

दिल में कफ़न-सी ख़ामोशी,
मैं जी रहा हूँ,

जैसे किसी और की

लिखी हुई कहानी।

 

तक़दीर के पन्ने जलकर अब राख़ हुए,

मोहब्बत के तमाम सिलसिले ख़ाक हुए।
जिस वक़्त मैं दर्द का हिसाब लिखता हूँ,
वक़्त ही मुझसे बेवजह मुँह मोड़ लेता है।

 

लोग यहाँ उत्सव मनाते हैं —
एक नए वर्ष के आगमन का,

पर मैं लिखता बस एक ही वाक्य —

‘कब ख़त्म होगा ये दर्दभरा सफ़र?’


  मोहब्बत, रिश्तेदारी, दोस्ती —

सब कुछ तो है यहाँ,
फिर भी लगे सब झूठा,

जैसे टूटा हुआ असर।

 

सालों के इस अंतहीन सफ़र से

थक गया है ये दिल,
‘हैप्पी बर्थडे’ की हर आवाज़ के पीछे

कहीं छुपी है एक ‘डेड विल’।

 

मेरे लिए ये दिन

कोई उत्सव नहीं,
ये तो उलटी गिनती है,

इंतज़ार की एक ख़ामोश घड़ी।


हर साल सोचता हूँ —

‘बस एक बार ओर...

फिर सब ठीक होगा,’
पर हर बार वही रात,

वही तनहा मोड़,

वही अँधेरा।

 

मैं कवि नहीं, बस एक थका
जीवन का पात्र बना हूँ,
रंगमंच के इस नाटक में
एक मौन अभिनय बना हूँ।

मैं एक फ़नकार हूँ,
ज़िंदगी का उदास नमूना-सार हूँ।

 

कल्पना करता हूँ अक्सर —

काश ऐसा संभव हो,
जिस दिन जन्मा था मैं,
उसी दिन अंत भी सम्पन्न हो।
ताकि एक पूरा घेरा बन जाए —
जन्म और मृत्यु एक ही तारीख़ में समा जाएँ।


कितना हसीन होगा यह इत्तिफ़ाक, यह मंज़र,
कि जिस तारीख़ को आया था, उसी पर रुक जाऊँ,
मौत का उपहार मिले मुझे मेरे ही जन्मदिन पर,
और हँसते-हँसते मैं खाक में मिल जाऊँ।

 

न कोई रोता रहे, न याद में जले,
बस एक शांत सी हो गुडबाय,

जैसे रात के बाद नया सवेरा आये,
पर मैं उस सवेरे में ना रहूँ भाई।

न याद करना मेरी कोई बात,
मैं ख़ुश रहूँगा उस महफ़िल में,

जहाँ न धोखा, न हालात की फ़रियाद।

 

न कोई फ्यूनरल हो, न फ़ेयरवेल पोस्ट,
बस एक ‘सीन’ पे ख़त्म हो ये सब, ऐ-दोस्त !
जो डायरी छोड़ी, उसका आख़िरी पन्ना गर पढ़े कोई,
तो बस इतना लिखा मिले:

‘मैं थक गया हूँ। बस अब और नहीं।’


एक ही केक, मगर दो हो लौ,
एक जन्म की, एक मृत्यु की —

आरम्भ और अंत का मिलन हो,
यही सबसे अच्छा उपहार हो।

 

जब कोई अगला साल नहीं,

तो विडंबना भी मुस्कुरा उठेगी,

समय भी थम जाएगा —

जहाँ शुरुआत ही अंत होगी।

 

मोमबत्तियाँ जलेंगी,

और मैं बुझ जाऊँगा।
लोग केक काटेंगे,

और मैं

अपने अस्तित्व का

आख़िरी टुकड़ा बन जाऊँगा।


शायद यही न्याय है —

जिस दिन जीवन मुझे धोखा देगा,
उसी दिन मौत मुझे

गले लगाकर सच्चाई दिखाएगी।

 

वैसे तो मैं नास्तिक हूँ,

ख़ुदा के वजूद पर
मुझे कोई यक़ीन नहीं,

लेकिन अगर वह फिर भी हैं,

तो उससे एक आख़िरी ख्वाहिश हैं —

मुझे ले जाए आज ही वह।

यह सफ़र यहीं थम जाए,
बिना शोर, बिना निशान।

और अगर फिर कोई पूछे

तो बस इतना कहा जाए —

‘वह चुपचाप चला गया,

जिस दिन वह आया था,
उसके जन्मदिन पर

ख़ामोशी से, ख़ुशी से।’

 

बस इतना याद रहे —

दर्द भी कभी हसीन होता है,
और मौत,

अगर अपनी हो,

तो वह भी एक तोहफ़ा लगता है,
जन्मदिन का।

 

ऐ – हार्दिक !

अब गिनना छोड़
इन ज़ख़्मों की यह सूची।

यह कोई उपलब्धि नहीं,

बस एक धीमी

आत्महत्या का दस्तावेज़ है।

 

ये ज़ख़्म कहाँ-कहाँ से मिले?
छोड़ इन बातों को —

अब इनका हिसाब क्या करना?
गिनते-गिनते उम्र भी थक जाती है।

 

ऐ – ज़िन्दगी !

तू गवाह है —

मैं हर दिन थोड़ा मरता रहा,
तेरे हर ऋण को चुकाने में
अपना अस्तित्व खोता रहा।
तू बस इतना बता दे,

ये साँसों का कर्ज़ कब खत्म होगा?

 

लोग कहते हैं कि आज मेरा ‘ख़ास’ दिन है,
मुबारकबाद का शोर है, महफ़िल सजी है।
पर उन्हें कैसे बताऊँ —

कि ये जिस्म तो बस एक साया है,
असली ‘हार्दिक’ तो बरसों पहले

कहीं चुपचाप मर चुका है।

 

आज वे कहते हैं —

“जन्मदिन है तुम्हारा।”

पर यह कैसी विडंबना है?
एक मृत हृदय के लिए यहाँ
जीवन की घोषणा है।

 

क्योंकि सच यह है —

‘हार्दिक’ उस दिन नहीं जन्मा था,

जिस दिन उसका नाम रखा गया —

मगर वह उस दिन

ज़रूर मर गया था,

जब उसने पहली बार

खुद को समझना शुरू किया।

 

तो आ जा, ऐ – मौत !,

आज ही आ जा,

कि आज मेरा जन्मदिन है,

और तू ही है अब

मेरी आखिरी चाहत।

 

ना कोई शिकवा रहे,

ना कोई अधूरी हसरत

तारीख वही हो

 बस सफ़र का

रुख मुड़ जाए,

मेरे जन्म का दिन ही,

मेरी रूह की

रिहाई बन जाए।

 

क्योंकि कभी-कभी,

मर जाना ही

सबसे सच्चा जश्न होता है —

उन लोगों के लिए,

जो बहुत पहले

जीना छोड़ चुके होते हैं।

 

मौत का ये अनोखा उपहार,

जन्म के उत्सव में अंत का संगीत बजाए,

जख्मों की डायरी चुपचाप बंद हो जाए,

सफ़र थमे और बस

शांति का गहरा आलिंगन रह जाए।

 

खुश रहो, मेरे दोस्त, इस अंतिम जश्न में —

जन्मदिन मुबारक हो मुझे, मृत्यु की बाहों में!

यही सबसे मुकम्मल और आखिरी तोहफा होगा,

सफर भी खत्म होगा,

और ये अंतहीन दर्द भी किसी दिन सो जाएगा।

 

आख़िर में बस इतना कहना है —


“मुझसे न पूछो, ज़िंदगी का मतलब क्या हैं,
मैं तो बस इंतज़ार में हूँ,
कि मौत कब मेरा जन्मदिन याद रखे,

और चुपचाप मुझे अपने पास बुला ले जाए।”

 

– हार्दिक जैन। ©
  इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।

𝐖𝐫𝐢𝐭𝐜𝐨. ©

𝐈𝐧𝐬𝐭𝐚𝐠𝐫𝐚𝐦.©

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कठिन शब्दों के अर्थ - (कविता के सन्दर्भ में)

 

1. आरज़ू - इच्छा / चाह।
2. मुकम्मल - पूरा / संपूर्ण।
3. नग़मे - गीत / गाने।
4. मक़्ते - ग़ज़ल का आख़िरी शेर।
5. मुंतज़िर - इंतज़ार।
6. क्षीण – कमज़ोर / धीरे-धीरे घटता हुआ।

7. अंतहीन - जिसका कोई अंत न हो।
8. डेड विल - जीने की इच्छा का खत्म हो जाना।
9. फ़नकार - कलाकार।
10. नमूना-सार - उदाहरण।
11. घेरा - चक्र / गोल दायरा।
12. मंज़र - दृश्य / नज़ारा।
13. फ्यूनरल - अंतिम संस्कार।
14. फ़ेयरवेल - विदाई।
15. विडंबना - उलझन भरी सच्चाई / अजीब स्थिति।
16. ऋण - कर्ज / उधार।
17. शिकवा - शिकायत।
18. हसरत - अधूरी इच्छा।
19. रिहाई - मुक्ति / छुटकारा।
20. आलिंगन - गले लगाना।


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