“ कफ़न-ऐ-कब्र ”
“ कफ़न-ऐ-कब्र ”
“मेरी आखिरी ख्वाहिश”
— एक नास्तिक की वह प्रार्थना जो कभी लिखी नहीं गई। —
— एक इंसान का वह कफ़न जो किसी धर्म का कर्ज़ नहीं था। —
दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:
इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि इंसान का असली रिश्ता किसी धर्म, रीति-रिवाज या मान्यताओं से नहीं, बल्कि अपनी सच्चाई और अपने भीतर की शांति से होता है। यह कविता एक ऐसे इंसान की आवाज़ है जो बहुत थक चुका है। वह भगवान से नाराज़ नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे उससे दूर हो गया है, क्योंकि उसे वहाँ कोई जवाब या सुकून नहीं मिला। कवि अपनी मृत्यु को भी अपने तरीके से जीना चाहता है। वह नहीं चाहता कि उसकी मृत्यु पर कोई धर्म हावी हो। वह सिर्फ मिट्टी में मिल जाना चाहता है, साधारण तरीके से, बिना किसी दिखावे, बिना किसी रस्म के। कवि की यह आख़िरी ख्वाहिश दरअसल एक तरह की आज़ादी है, धर्म से, पहचान से, और शायद अपने ही दर्द से भी आज़ादी। असल में, यह कविता एक आज़ाद रूह की वह आखिरी पुकार है जो दुनिया के तमाम बंधनों को छोड़कर प्रकृति की गोद में हमेशा के लिए सो जाना चाहती है।
न फ़लक की आरज़ू है, न सितारों का गुमाँ,
मुझे मिट्टी में मिला दो, यही मेरा आसमाँ।
जो विरासत में मिली थी, वो कहानी जला दी,
मैंने अपने ही हाथों, अपनी हस्ती मिटा दी।
एक ख़ामोश-सी दरार थी वक़्त की पेशानी पर,
जिसमें गिरती रही मेरी हर अनकही दास्ताँ।
न शोर था, न सज़ा, न कोई फ़ैसला मुकम्मल,
बस एक लंबा सन्नाटा था, और मैं उसका कारवाँ।
जन्म से बँधा था जो धर्म-चक्र का सिलसिला,
वह धागा मैंने ख़ुद अपने हाथों से ही तोड़ दिया।
‘अहिंसा’ की कोख से जन्मा एक ‘नास्तिक’ हूँ मैं,
जिसने ख़ुदा से सदा के लिए अपना रुख़ ही मोड़ दिया।
‘जैन’ कुल में जन्मा मैं, मगर रास्ता अलग चुना,
धर्म की बेड़ियों से दूर, एक किस्सा नया बुना।
न मंदिर में यक़ीन मेरा, न मूरत से कोई वास्ता,
मुझे सदा जँचता बस मिट्टी का ही यह रास्ता।
मैं जन्म से एक रवायत था, पर रूह मेरी आज़ाद रही,
हर बंधन तोड़ता आया, पर तन्हाई मेरे साथ आबाद रही।
धर्म विरासत में मिला, पर मन ने ठुकरा दिया,
सोच ने हर नक़्श पुराना, एक पल में मिटा दिया।
सच की तलाश में निकला, पर धर्म के रब ने कोई बात न की,
बस अंधेरों ने दोस्ती निभाई, रौशनी ने हर दफ़ा मात दी।
ना मंदिर की घंटी में सुकून, न शब्दों में कोई अरदास
बस ख़ामोशी की चादर ओढ़े जी रहा हूँ हर एक साँस।
हर रात ने पूछा — ‘तू ज़िंदा है या महज़ चलती साँस है?’
मैं चुप रहा हर बार, क्योंकि जीना भी एक त्रास है।
ये ज़िंदगी भी अजीब है, न पूरी मेरी, न अधूरी,
हर ख़ुशी लगती झूठी, हर मुस्कान जैसे मजबूरी।
मुझे उस अग्नि के सुपुर्द हरगिज़ मत करना,
जो धुआँ बनकर मेरी हस्ती को उड़ा देगा।
मैं राख होकर फ़िज़ाओं में भटकना नहीं चाहता,
वो शोला मेरे वजूद का हर निशाँ मिटा देगा।
बहुत जला हूँ जीवन में, अब और जलना नहीं मुझको,
किसी दरिया की लहरों में, अब बहना नहीं मुझको।
ना कुर्बत-ए-मसीहा, न जन्नत का लालच हो,
बस एक मिट्टी की चादर हो, जिसमें सुकून-ए-दिल की बरकत हो।
जलाना मत मुझे, मैं धुआँ बन बिखर जाऊँगा,
दफना देना ख़ामोशी से, शायद मिट्टी में ही सुधर जाऊँगा।
जहाँ न पुनर्जन्म का ख़ौफ़, न मोक्ष की कोई प्यास,
बस मिट्टी की महक हो, और ख़त्म हो हर एक आस।
जब अंतिम पल पास आए, बस इतनी-सी आस रह जाए,
ना आग मुझे लपेट पाए, न धुआँ कहीं ले जाए।
मुझे मिट्टी की गोद में सुलाया जाए, जहाँ शब्द भी थम जाए,
शायद उसी ठंडी तह में ये दर्द के पल भी जम जाए।
ना शोर हो, न रस्में, न धर्म का कोई बंधन हो,
बस एक कफ़न हो सादगी-सा, और मिट्टी का हल्का सा चुंबन हो।
उस कफ़न में ज़माने का कोई भी दाग़ न हो,
ऐसी नींद सोऊँ गहरी, जिसमें कोई ख़्वाब न हो।
कफ़न हो बिना नाम और पहचान के,
ताकि लौट जाऊँ उसी में जहाँ आया था अनजान से।
दफनाना मुझे ऐसे कि कोई गवाह न हो,
ना रोने की औक़ात, न चीख़ने की पनाह हो।
कफ़न-ए-क़ब्र की ठंडी छाँव, मेरी रूह को सुकून देगी,
जो ज़िंदगी न दे सकी कभी, शायद मौत वो जुनून देगी।
बस इक ‘हार्दिक’-सा सन्नाटा, मेरी पहचान बन जाए,
मिट्टी की ये दबी परतें मेरा सम्मान बन जाए।
अब अंतिम साँस तक जाने दो गहराइयों में मुझे,
मिट्टी की सादगी के सिवा कुछ और न समझाना मुझे।
वह गीत हूँ मैं जो कभी गाया नहीं जा सकता,
वह बात हूँ जो जबान तक आकर भी कही नहीं जा सकती।
यही मेरी आख़िरी ख्वाहिश, न कोई सवाल, न कोई जवाब,
बस मिट्टी में समा जाऊँ और ख़त्म हो जाए हर जज़्बात।
मैं क्या था, क्यों था, किसका था, ये बात वहीं रह जाने देना,
मिट्टी की ख़ामोश तह में मुझे बे-आवाज़ सो जाने देना।
ऐ - हार्दिक !
ये कफ़न किसी ममता का सिला हुआ नहीं,
ये क़ब्र किसी याद में लिखा हुआ ख़त नहीं।
बस एक ख़ामोशी है, जो मेरी जुबान बनी,
जहाँ कोई मजहब नहीं, कोई ख़ुदा नहीं,
बस मैं हूँ और मिट्टी की ख़ुशबू ही है।
ज़िंदगी की धूप ने बहुत जलाया है मुझे,
अब मौत की छाँव में थोड़ा ठहरने दो।
वजूद मेरा क़ैद रहा बरसों रिवाजों में,
अब क़ब्र की गहराई में उसे बिखरने दो।
कोई फूल न रखना कब्र पर; फूल झूठे होते हैं,
सिवा मिट्टी के और कोई रिश्ते नहीं सच्चे होते हैं।
मैं जन्मों से हूँ अकेला, मौत भी अकेली ही सही,
बस इतना कहना है कि जलाना मुझको कभी नहीं।
“कह दिया सब कुछ, अब और कुछ नहीं कहना,
ये आख़िरी एक तमन्ना है, इसे पूरा कर ही देना।
जब मौत की नींद आए मुझे, मुझको न जलाना,
बस मिट्टी की आगोश में, सदा के लिए दफना देना।”
“यही मेरी आख़िरी ख्वाहिश है —
बिना किसी पैग़ाम के,
बिना किसी दुआ के,
बिना किसी नाम के।”
“Jain by birth”
But
“Atheist by choice.”
– हार्दिक जैन। ©
इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।
𝐖𝐫𝐢𝐭𝐜𝐨. ©
कठिन शब्दों के अर्थ - (कविता के सन्दर्भ में)
1. फ़लक - आसमान।
2. आरज़ू - इच्छा / चाह।
3. गुमाँ - घमंड / भ्रम।
4. पेशानी – माथा / समय का चेहरा या कठोरता का प्रतीक।
5. कारवाँ – काफिला / यात्रा।
6. रुख़ – दिशा / मुँह फेरना।
7. रवायत – परंपरा / रिवाज।
8. नक़्श – छाप / निशान।
9. त्रास – कष्ट / पीड़ा।
10. सुपुर्द - सौंपना।
11. हस्ती - अस्तित्व।
12. फ़िज़ाओं – वातावरण / हवा।
13. कुर्बत-ए-मसीहा - भगवान के पास होना।
14. बरकत - कृपा।
15. सादगी-सा – सरलता / बिना दिखावे का।
16. चुंबन - हल्का स्पर्श।
17. पनाह – शरण / सहारा।
18. आगोश – गोद / बाँहों में लेना।
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