“ग़ज़ल: वजूद-ए-नातमाम”
“ग़ज़ल: वजूद-ए-नातमाम”
“नहीं हूँ मैं”
( — अधूरे मनुष्य की गरिमामयी स्वीकृति — )
इस ग़ज़ल के द्वारा कवी अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है की इंसान का अधूरा होना उसकी हार नहीं होता, बल्कि वही उसकी असली पहचान और गरिमा होती है। बाहर से टूटे, थके या चुप दिखाई देने वाला मनुष्य अंदर से अब भी उम्मीद, रौशनी और सफ़र को सँभाले रहता है। दुनिया उसे जैसे भी नाम दे, वह अपने वजूद को ख़ुद समझना और ख़ुद लिखना चाहता है। यह ग़ज़ल उसी शांत स्वीकृति की बात करती है जहाँ इंसान मान लेता है कि पूरा होना ज़रूरी नहीं, क्योंकि कभी-कभी अधूरापन ही सबसे सच्चा सच और सबसे गहरी याद बन जाता है।
जो दिख रहा हूँ वैसा तमाशा नहीं हूँ मैं,
दुनिया के फ़ैसलों का इशारा नहीं हूँ मैं।
शिकस्त की कोई नहीं है आख़िरी दास्ताँ,
वक़्त के हाथ लिखा फ़ैसला नहीं हूँ मैं।
हर मोड़ पर जिसे तुमने हारा हुआ कहा,
उस हार की किताब का पन्ना नहीं हूँ मैं।
थक गया है जिस्म, पर रूह सफ़र में अब भी है,
बुझा हुआ कोई मयख़ाने का चराग़ नहीं हूँ मैं।
मैं अपने दर्द को अर्थ में ढाल सकता हूँ,
महज़ बिखरा हुआ लफ़्ज़-साया नहीं हूँ मैं।
चुप हूँ तो इस तरह कि सदा भीतर उतर सके,
सुनसान होता केवल सहरा नहीं हूँ मैं।
हर शक्ल में टूट कर फिर जो बना हूँ,
किसी एक आईने में ठहरा नहीं हूँ मैं।
धूपों ने जला डाले कई ख़्वाब रास्ते में,
पर सिर्फ़ बनता धुआँ नहीं हूँ मैं।
गिरना भी एक सलीक़ा-ए-परवाज़ बन गया,
ज़मीं पे पड़ा कोई बे-क़ीमत सिक्का नहीं हूँ मैं।
ख़ामोशियों ने गढ़ा कुछ अजीब तरह,
पत्थर की तरह बिल्कुल जड़ा नहीं हूँ मैं।
तन्हा खड़ा हूँ राह के वीरान मोड़ पर,
भीड़ोँ की धड़कनों का सहारा नहीं हूँ मैं।
वजूद मेरा हार की तौहीन क्यों बने,
मिटता हुआ कोई नक़्शा नहीं हूँ मैं।
ये रात मुझको अँधेरों में क़ैद क्या करे,
सहर का बंद कोई दरवाज़ा नहीं हूँ मैं।
मैं अपने होने की तफ़सीर ख़ुद लिखूँगा कभी,
किस्सों की बंद किताब का दर्ज़ हिस्सा नहीं हूँ मैं।
जो कुछ बचा है मुझमें वही रौशनी का राज़ है,
पूरी तरह बुझा हुआ कोई तारा नहीं हूँ मैं।
इल्ज़ाम वक़्त ने मुझ पर कई लिखे मगर,
अपनी ही नज़रों से उतरा नहीं हूँ मैं।
चाहा था कभी ख़ुद ही कविता बन जाऊँ,
सिर्फ़ लिखने वाला चेहरा नहीं हूँ मैं।
मुझे लिखना था ख़ुद को एक सादा-सी हक़ीक़त में,
मगर जो बन गया काग़ज़ पे वो सच्चा नहीं हूँ मैं।
मैं चाँद हो के भी अगर आँखों में न उतरूँ,
बेकार कोई दूर ठहरा उजाला नहीं हूँ मैं।
मैं एक बहता लम्हा हूँ यादों की नदी के बीच,
ठहर जाऊँ अगर पल भर तो दरिया नहीं हूँ मैं।
सतहें तलाशती हैं मुझे किस लिए भला,
गहराइयों से कम कोई नहीं हूँ मैं।
तदबीर हार जाए तो तक़दीर क्या करेगी,
ख़ुद अपने इम्तिहान से भागा नहीं हूँ मैं।
मैं अपनी तमन्ना का हमेशा से क़ैदी रहा,
मगर जिस ख़्वाब ने बाँधा, वो धागा नहीं हूँ मैं।
मेरे हिस्से की ख़ामोशी भी रूठ जाती है मुझसे,
अपने ही सुकून का साया नहीं हूँ मैं।
साया भी छोड़ जाए अगर दोपहर तले,
अंदर से फिर भी बिल्कुल अकेला नहीं हूँ मैं।
दुनिया ने बार-बार मुझे तोड़कर देखा,
लेकिन अपनी ही रूह से टूटा नहीं हूँ मैं।
हर आवाज़ में ढूँढा गया मेरा ही अफ़साना,
किसी की दास्ताँ का सिलसिला नहीं हूँ मैं।
देखना कल फिर उगूँगा ख़्वाब की मिट्टी से,
यूँ ही फेंका हुआ बीज नहीं हूँ मैं।
मुझे पढ़ते रहे सब उम्र भर लफ़्ज़ों की सूरत में,
मगर जो अर्थ में छू ले वो मतलब नहीं हूँ मैं।
जो तुम समझ रहे हो वही आख़िरी नहीं,
कहना अभी बहुत है; कह चुका नहीं हूँ मैं।
ऐ – हार्दिक —
ये जान कि लिखना ही मेरी साँसों में है,
कलम से पहले का सन्नाटा नहीं हूँ मैं।
“हार्दिक” सपनों की उन्हीं गलियों में ढूँढता हूँ ख़ुद को,
जो मिल के भी मिल जाए, वो “मैं”, नहीं हूँ मैं।
एक धीमा ख़ामोश स्वीकार —
“शायद पूरी तरह होना ही
सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है।
कभी-कभी अधूरापन ही स्मृति का
सबसे सच्चा रूप होता है।।”
– हार्दिक जैन। ©
इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।
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कठिन शब्दों के अर्थ - (कविता के सन्दर्भ में)
1. नातमाम - अधूरा।
2. गरिमामयी - आत्मसम्मान से भरा हुआ।
3. मयख़ाने - जीवन के दर्द और भटकाव का प्रतीक।
4. सहरा - वीरान रेगिस्तान; गहरी तन्हाई और खालीपन का संकेत।
5. सलीक़ा-ए-परवाज़ - गिरकर भी फिर उठने की कला।
6. जड़ा - बिल्कुल स्थिर।
7. तौहीन - अपमान।
8. तफ़सीर - अपने अस्तित्व को समझाना।
9. सादा-सी हक़ीक़त - सरल और बिना बनावट की सच्चाई।
10. तदबीर - सोच-समझकर किया गया प्रयास या उपाय।
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