“नज़्म-ए-एहसास: माँ - खुदा का अक्स”

“नज़्म-ए-एहसास: माँ - खुदा का अक्स”

 

( नास्तिक का ख़ुदा; नास्तिक का विश्वास - माँ )

 

दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:

 

इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है की माँ केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता संसार है। वो किसी बड़ी बातों में नहीं, बल्कि हमारी रोज़ की छोटी-छोटी आदतों, खामोशियों और एहसासों में बसी होती है। वो हर उस पल में साथ होती है, जहाँ हम ध्यान भी नहीं देते। कवि यह भी बताना चाहता है कि भले ही वो खुद को नास्तिक मानता हो, लेकिन उसके लिए माँ ही सबसे सच्चा और सबसे करीब “खुदा” जैसा एहसास है। उसे ईश्वर को कहीं बाहर या किसी अनदेखी शक्ति या पत्थरों में ढूँढने की ज़रूरत नहीं लगती, क्योंकि माँ की ममता और उसकी मौजूदगी में ही दुनिया का सबसे बड़ा सच और सुकून छिपा है। अंत में, कवि स्वीकार करता है कि उसकी अपनी कोई अलग पहचान नहीं है, वह जो कुछ भी है, बस अपनी माँ की वजह से ही है। ये नज़्म किसी सोच या धर्म की बहस नहीं है, यह एक नास्तिक बेटे का अपनी माँ में ख़ुदा को महसूस करने का बेहद सच्चा, निजी और भावुक इक़रार है।

 

“ तुम हो, माँ, तो सब कुछ है। ”

 

मेरे बे-रंग जीवन में महकता बाग़ हो तुम माँ,

अंधेरी रात में जलता हुआ चिराग़ हो तुम माँ।

 

हर सुबह जब आँख खुले, तब पास हो तुम माँ,
मेरे दिन का पहला मुकम्मल एहसास हो तुम माँ।

 

दिनों की हलचल हों या ठहरी हुई कोई साअत,

मेरे हर काम में शामिल-सी हो तुम माँ।

 

अँधेरी रात की चुप्पी में भी आहट सी रहती है,

जो नींदों के झरोखों से आए, वह आवाज़ हो तुम माँ

 

रोटियों की वो महक, भाप की नरमी में,
भूख से पहले जो रूह को तृप्त करें,

वो स्वाद हो तुम माँ।

 

सलीक़ा सिलवटों का हो या तहज़ीबों की मूरत का,

जो घर को घर बना दे, वो हसीन बुनियाद हो तुम माँ।

 

बिना बोले ही कमरे का मिज़ाज जो बदल डाले,

घर की रूहों को फिर से जगा देती हो तुम माँ।

 

मैं उलझूँ तो बिना पूछे सुलझा देती हो,
मेरी हर गाँठ की जैसे कोई चाबी हो तुम माँ।

 

मेरी ख़ामोशी को पढ़ लेती हो जैसे कोई किताब,
बिन कहे सब कुछ जानने का दिल हो तुम माँ।

 

अपने सख़्त लफ़्ज़ों में डांटती हो तो भी लगे दुआ जैसी ,

रहमत-सी बन के बरसें, वो बरकत हो तुम माँ।

 

ज़रा-सी चोट पे रातों को जागती रहती,

मोहब्बत का सबसे सच्चा अक्स हो तुम माँ।

 

मैं गिरूँ उससे पहले ही थाम लेती हो हाथ,
मेरे हर क़दम की ख़ामोश हिफ़ाज़त हो तुम माँ।

 

मेरी हर साँस की तासीर हो तुम माँ,
मेरे चेहरे की झिझकती हँसी हो तुम माँ।

 

दुनिया से कितना कुछ तो छुपा रखा है मैंने,
पर मेरे हर राज़ की हमराज़ हो तुम माँ।

 

नहीं है ख़ौफ़ मुझे मंज़िलों की सख़्त राहों का अब,

मेरे वास्ते रास्ता, सफ़र और पड़ाव भी हो तुम माँ।

 

कहाँ फुर्सत कि मैं ढूँढूँ किसी अदृश्य हस्ती को,

मेरी आँखों के आगे ख़ुदा का स्वरूप हो तुम माँ।

 

मैंने ख़ुदा को नहीं देखा, मगर तुम्हें देखा है,
मेरे तुच्छ वजूद का सबसे करीबी क़यास हो तुम माँ।

 

मैं नास्तिक सही, ऊँचे दावों की ज़रूरत नहीं मुझको,

लेकिन मेरे हर यक़ीन से बहुत बढ़कर हो तुम माँ।

 

क्यों भटकूँ चौखटों पर मैं, क्यों सजदों में पत्थर पूजने जाऊँ?

मेरे आँगन में चलता-फिरता भगवान हो तुम माँ।

 

मैंने तमाम मंदिर भी टाले, सजदे भी छोड़ दिए,
मेरे हर ज़िक्र का मरकज़ हो तुम माँ।

 

ज़माना ढूँढता फिरता है तीर्थ-ओ-जियारत को,

मेरे चारों तरफ़ फैला हुआ पावन धाम हो तुम माँ।

 

नहीं मतलब मुझे अर्श-ओ-मकाँ की ऊँचाइयों से,

मेरे हिस्से की जन्नत का नूरानी चेहरा हो तुम माँ।

 

दर्द उठे तो लब पर पहला नाम भी आता तुम्हारा,
मसीहाई का भी एक नमूना हो तुम माँ।

 

मेरी नज़्मों में जो गहराई और ठहराव आता है,

सच्चाई का वही सबसे हसीन अंदाज़ हो तुम माँ।

 

तुम्हें देखकर ही ज़िंदगी को जाना है मैंने,

मेरी किताब-ए-ज़ीस्त का ख़ूबसूरत बाब हो तुम माँ।

 

ग़लत है कहना कि तुम बस परछाईं हो मेरी,

मैं परछाईं हूँ तेरी, मेरा सहारा हो तुम माँ।

 

बहुत छोटे हैं लफ़्ज़ बहुत कमज़ोर हैं जज़्बात,

इस दरिया-ए-हस्ती से भी ज़्यादा गहरी हो तुम माँ।

 

ये काग़ज़, ये कलम तो महज बहाना हैं लिखने का,

मेरी हर नज़्म का असल अल्फ़ाज़ हो तुम माँ।

 

वक़्त बदला, मगर तुम्हारी वो आदत नहीं बदली,

मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी की गहरी सच्चाई हो तुम माँ।

 

ये दुनिया सादी और सच्ची कहीं दिखती नहीं मुझको,

मगर इन सब के बीच में, हक़ीक़त-ए-राज़ हो तुम माँ।

 

यही अरमान है अब तो कि तू हँसती रहे हरदम,

मेरी राहत की हर सुबह का सवेरा हो तुम माँ।

 

मैं क़दमों में तेरे अपना ये सारा जग लुटा दूँगा,

इस ज़मीं पर सबसे अनमोल हीरा हो तुम माँ।

 

अब “हार्दिक” ये समझा है इसी जीवन में,
उसके होने की इकलौती वजह हो तुम माँ।

 

“हार्दिक” ने लिखी यह नज़्म बस तेरे नाम,
हर शेर में तेरी ही बातें, बस तुम ही हो तुम माँ।

 

– हार्दिक जैन। ©
  इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।

 

 

कठिन शब्दों के अर्थ - (कविता के सन्दर्भ में)

 

1. साअत - छोटा-सा पल।

2. झरोखों - छोटी खिड़कियाँ / झाँकने का रास्ता।

3. रहमत - दया / कृपा।

4. तासीर - असर / प्रभाव।

5. हमराज़ - वह जो दिल की हर बात जानता हो।

6. क़यास - अंदाज़ा / अनुमान / समझ।

7. मरकज़ - केंद्र।

8. तीर्थ-ओ-जियारत - पवित्र जगहों पर जाना।

9. अर्श-ओ-मकाँ - आसमान और ज़मीन।

10. नूरानी - रोशनी से भरा हुआ।

11. मसीहाई - दर्द दूर करने की ताक़त।

12. किताब-ए-ज़ीस्त - ज़िंदगी की किताब।

13. बाब - अध्याय / हिस्सा।

14. दरिया-ए-हस्ती - अस्तित्व का समुद्र।

15. हक़ीक़त-ए-राज़ - सबसे छुपा हुआ सच।

 

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