“वजूद की ज़मीन: पिता के नाम”

“वजूद की ज़मीन: पिता के नाम”

 

 

‘ पितृ दिवस ( 21 जून, 2026; रविवार ) के मौके पर

अस्तित्व और मनुष्यता के संदर्भ में पिता को समर्पित कविता ’

 

 

दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:

 

इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि उसके लिए पिता का स्थान इस दुनिया में सबसे ऊँचा है। पिता केवल परिवार के पालन-पोषण करने वाले व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे हमारे जीवन की सोच, समझ, चरित्र और मनुष्यता की नींव होते हैं। यह एक ऐसे नास्तिक बेटे के दिल की आवाज़ है जो किसी अनदेखे भगवान या किस्मत के भरोसे नहीं बैठता, बल्कि अपने पिता की रोज़ की मेहनत, उनके बहते हुए पसीने और उनके संघर्ष को ही असली सच मानता है। इस कविता के पीछे का सबसे गहरा विचार यह है कि सच्चा उपहार कोई चीज़ या शब्द नहीं होता; सच्चा उपहार वो इंसान बनना है जो पिता ने तुम्हें बनाया था।

 

अंततः इस कविता का दार्शनिक पक्ष यह है कि कवि वजूद (अस्तित्व) की नींव पिता को मानता है, न कि किसी अदृश्य शक्ति को। वह मानवता को ही सबसे बड़ा चमत्कार बताता है, और पिता को उस चमत्कार का जीता-जागता उदाहरण। इसलिए यह कविता सिर्फ पिता की तारीफ  या उनको समर्पित एक धन्यवाद नहीं, बल्कि एक ‘जीने का तरीका’ सिखाने वाला घोषणापत्र भी है।

 

 

न कोई अंबर का सुल्तान है, न कोई नियति का लेख है,

मेरी सृष्टि के आदि-अंत, पापा! आप ही साक्षात् विवेक हैं।

नहीं माँगता उस ईश्वर से आशीष, जो कभी दिखा नहीं,

मैंने तो आपसे सीखा है, जो किसी किताब में लिखा नहीं।

 

इस बेआवाज़, निरुद्देश्य ब्रह्मांड के गहरे, निर्जन सन्नाटे में,

आप ही थे, जिसने मुझे वजूद का पहला पाठ पढ़ाया।

जहाँ न कोई देवदूत था, न कोई अदृश्य विधाता,

वहाँ आपकी ठोस उँगलियों ने ही मुझे
चलना और संभलना सिखाया।

 

वह कोई रहम-ओ-करम या तक़दीर का खेल नहीं,

पसीने की बूँदों का दरिया है, कोई अंधा मेल नहीं।

दुनिया कहती रही: सब ऊपर वाले की इनायत है,

मैंने देखा: वह तो पिता की उम्रभर की मशक्क़त है।

 

जहाँ लोग पत्थरों में ढूँढ़ते रहे वजूद की वजह,

वहाँ मेरी चेतना को गढ़ता आपका तजुर्बा था।

 

लोग झुकते हैं किसी अनदेखी कल्पनाओं के आगे,

पर मेरे लिए सत्य का वह जीवंत स्वरूप आप हैं।

जो इस संसार की कड़वी धूप को खुद पर झेल गया,

मेरी आँखों का वो सबसे ऊँचा, सघन बोधिवृक्ष आप हैं।

 

पापा, आप ही मेरे नायक हैं, मेरे अस्तित्व का आधार,

फिर इस नश्वर संसार का मैं आपको क्या दूँ उपहार?

 

मैं आपको देवता कहकर आपका क़द छोटा नहीं करूँगा,

देवताओं की कथाएँ झूठी हैं, मैं उनको नहीं मानूंगा।

मैंने तो मनुष्यता का सबसे बड़ा चमत्कार आपमें प्रत्यक्ष देखा है,

त्याग और संघर्ष का एक जीवंत आकार आपमें देखा है।

 

न स्वर्ग का लालच दिया,

न नरक का भय दिखलाया,

बस इतना कहा कि:

किसी की आँख में आँसू मत देना,

यही सबसे बड़ी इबादत है,

यही सबसे सच्ची पूजा।

 

जब दुनिया जीतने की बातें करती थी,

आपने स्वयं को जीतना सिखाया,

जब लोग तलवारों के इतिहास पढ़ाते थे,

आपने अहिंसा का एक मौन अध्याय सुनाया।

 

आपने कभी कोई झूठा या अलौकिक चमत्कार नहीं किया,

आकाश से तारे तोड़ने का कोई फ़रेबी व्यापार नहीं किया।

बस टूटते हुए मेरे यक़ीन और मेरी डगमगाती हिम्मत को,

हर बार अपने असीम धैर्य से जोड़ा।

 

पापा !

आपने ही मुझको समझाया,

यह जीवन कोई वरदान नहीं,

यह संघर्षों की वह कविता है

जिसका कोई भगवान नहीं।

 

हर शेर समय लिखता है,

हर मिसरा परिस्थिति होती है,

हम सब अपनी ग़ज़लों की

अधूरी-सी बंदिश होते हैं।

 

फिर भी आप मुस्काते रहे,

घावों को उत्सव कहते रहे,

टूटी उम्मीदों की राखों में

नए सपनों को बोते रहे।

 

अब फ़ादर्स डे की इस सुबह

मैं बैठा यह विचार करूँ,

जिसने मुझको यह दृष्टि दी है,

उसे मैं क्या उपहार धरूँ?

 

मैं सोचूँ, क्या तोहफ़ा दूँ आपको,

जो आपकी क़ुर्बानी तौल सके,

दुनिया की सारी नेमत मिलकर भी,

आपके एहसान कहाँ खोल सके।

 

पापा !

 

मेरे लिए आप इसलिए महान नहीं

कि आपने त्याग किए,

 

बल्कि इसलिए कि

आपने अपने संघर्षों को

कोई महाकाव्य नहीं बनाया।

 

आपने आमदनी कमाईं,

ज़िम्मेदारियाँ उठाईं,

और हर शाम

थके हुए कंधों पर भी

घर को मुस्कुराहट दी।

 

मैं सोचता हूँ,

कि आपको क्या दूँ?

 

सोना दूँ?

जिसकी चमक समय छीन लेगा।

 

फूल दूँ?

जो अगले प्रभात मुरझा जाएँगे।

 

कोई भौतिक वस्तु?

वह भी समय के साथ पुराने हो जाएंगे।

 

शब्द दूँ?

जो मेरे कृतज्ञ हृदय से छोटे पड़ जाएँगे।

 

फिर सोचा…

 

यदि सचमुच आपको कुछ

अर्पित करना है,

तो मैं अपने भीतर

 

एक और अहंकार छोड़ दूँगा,

एक और हिंसा बहा दूँगा,

एक और पूर्वाग्रह तोड़ दूँगा।

 

किसी अजनबी के दुःख में

थोड़ी करुणा रखूँगा,

किसी निर्बल के पक्ष में

अपनी आवाज़ रखूँगा।

 

इसलिए पापा,

मैं कोई वस्तु नहीं लाया,

बस अपने चिंतन का दीपक

आपके चरणों तक ले आया।

 

यह वादा है,

अंधविश्वासों के जंगल में

विवेक का रास्ता चुनूँगा,

भीड़ जहाँ भी सच हर लेगी,

वहाँ अकेला सच कहूँगा।

 

यही मेरी सौग़ात रहे,

यही मेरा सम्मान रहे,

आपके जीवित दर्शन का

मुझमें थोड़ा-सा ज्ञान रहे।

 

पापा, आप मेरे हीरो हो,

क्योंकि आपने मुझे आकाश नहीं दिया,

उड़ने की दृष्टि दी है।

 

अब सोच रहा हूँ इस अवसर पर,

आपको मैं क्या उपहार दूँ?

जब स्वयं आपसे पाया जीवन,

तो क्या प्रतिदान का सार दूँ?

 

कोई वस्तु, कोई भौतिक साधन,

आपके कद से ऊँचा क्या होगा?

इस कृतज्ञ मन के मौन समर्पण से बढ़कर

और दूजा क्या होगा?

 

ऐ - हार्दिक !

जून की इस तपती धूप में, जो ठंडी छाँव सा मिलता है,

उसी के दम से आज ये वजूद मेरा खिलता है।

ना कोई दुआ, ना कोई सजदा, ना मन्नत का कोई धागा,

पिता की महफूज़ गोद में सोया, तो मैं हर वहम से जागा।

 

मैं आपको क्या उपहार दूँ?

शायद केवल इतना…

 

कि आपके दिए हुए मनुष्य को

मैं जीवन भर मनुष्य ही रहने दूँ।


– हार्दिक जैन। ©
  इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।

 

 

कठिन शब्दों के अर्थ - (कविता के सन्दर्भ में)

 

1. आदि-अंत - शुरुआत और समाप्ति।

2. विवेक - सही-गलत की पहचान करने की बुद्धि।

3. आशीष - आशीर्वाद।

4. निरुद्देश्य - बिना किसी निश्चित उद्देश्य के।

5. निर्जन - सुनसान।

6. देवदूत - फ़रिश्ता।

7. विधाता - सृष्टिकर्ता (भाग्य बनाने वाला) ।

8. रहम-ओ-करम - दया और कृपा।

9. इनायत - मेहरबानी।

10. मशक्क़त - कठिन परिश्रम / मेहनत।

11. चेतना – जागरूकता / सोचने-समझने की शक्ति।

12. सघन - गहरा।

13. बोधिवृक्ष - ज्ञान और आत्मबोध का प्रतीक वृक्ष।

14. नायक – हीरो / आदर्श व्यक्ति।

15. प्रत्यक्ष - उपस्थित।

16. अलौकिक - सामान्य संसार से परे।

17. असीम - जिसकी कोई सीमा न हो।

18. नेमत - वरदान।

19. कृतज्ञ - आभारी।

20. पूर्वाग्रह - पहले से बनी धारणा / पक्षपात।

21. सौग़ात - उपहार।

22. प्रतिदान - बदले में दिया गया उपहार।

 


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