“मसौदा-ए-ख़ामोशी”
“मसौदा-ए-ख़ामोशी”
(एक ऐसी तहरीर जहाँ कविता और ज़िंदगी
एक-दूसरे का प्रतिबिंब बन जाती हैं)
दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:
इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि कविता लिखना असल में काग़ज़ पर शब्द सजाना नहीं है, बल्कि अपने अंदर के गहरे दर्द, पुरानी यादों और अकेलेपन से आमना-सामना करना है। कवि बताता है कि हमारी ज़िंदगी भी इस पहले मसौदे की तरह ही है। मनुष्य अपनी ज़िंदगी को उस समय पूरी तरह नहीं समझ पाता जब वह उसे जी रहा होता है। जैसे कोई कवि पहली बार कविता लिखता है, वैसे ही हम सब अपनी ज़िंदगी का पहला मसौदा जीते हैं, जल्दबाज़ी में, उलझनों में, अधूरी समझ के साथ। इस कविता में मसौदा केवल लिखी हुई कविता का मसौदा नहीं है, बल्कि जीवन का प्रतीक है।
“मसौदा-ए-ख़ामोशी” महज़ एक नज़्म नहीं, बल्कि रचनात्मकता के अकेलेपन, स्मृतियों के दर्द और इंसानी अधूरेपन का एक गहरा दार्शनिक दस्तावेज़ है।
रात के एक उदास से कोने में
जब मेज़ पर पड़ी रौशनी भी
थक कर झुक जाती है।
मैं पहला मसौदा लिखता हूँ,
जैसे किसी बीते ख़्वाब की धुँधली राख,
जिसे सुबह ने बिना देखे ही
बुहार दिया हो,
और मैं, उस राख में
अपना ही चेहरा ढूँढ़ता हूँ।
वो लफ़्ज़ नहीं होते,
सिर्फ़ उनकी परछाइयाँ होती हैं,
बेआवाज़, बेतरतीब।
जैसे किसी उजड़े हुए मकान में
कदमों की गूँज रह गई हो।
मैं जल्दी-जल्दी लिखता हूँ,
कि ख़याल भाग न जाएँ
क्योंकि शायरी अक्सर ठहरती नहीं।
वो एक वक़्ती वहम है,
जो पकड़ में आते ही
अपनी हक़ीक़त खो देती है।
मैं लिखता हूँ वैसे,
जैसे गिरती हुई साँस को
पकड़ लेना चाहता हूँ,
जैसे कोई लफ़्ज़ भागता हुआ
मेरी उँगलियों से पहले ही
थककर मर न जाए।
मेरे लिए
हर मिसरा एक अधूरी हिफ़ाज़त है,
हर स्याही एक अधूरा इकरार।
पहला मसौदा…
दरअसल एक बुरी याद है,
जिसे दिमाग़ ने नहीं,
दिल ने जल्दबाज़ी में
दर्ज किया है।
उसमें आवाज़ें होती हैं
पर कोई चेहरा नहीं,
उसमें आँसू होते हैं
पर कोई आँख नहीं।
फिर मैं रुकता हूँ।
काग़ज़ मुझे देखता है,
जैसे पूछता हो
“क्या ये सच था ?”
वक़्त की ठंडी उँगलियाँ
धीरे-धीरे इन लफ़्ज़ों को छूती हैं,
और मैं उन्हें फिर से पढ़ता हूँ
जैसे अपनी ही यादों का मुक़दमा हो।
मैं उसे पढ़ता हूँ,
और मुझे ख़ुद पर यक़ीन नहीं होता
कि ये मैंने लिखा है,
या किसी और ने मेरे भीतर से
चुपके से गुज़रते हुए छोड़ दिया।
मैं उसे छूकर देखता हूँ,
और उसमें एक ठंडी सी
उदासी मिलती है,
जैसे किसी पुराने ख़त में
अब भी आँसुओं का
नमक बचा हो।
बाद के मसौदे धीरे आते हैं
जैसे कोई माज़ी
अपनी तहों को खोलते हुए
हिचकिचाता हो।
दूसरे, तीसरे, चौथे मसौदे
ये सब तर्जुमे हैं
उस ख़ामोशी के
जो पहले कभी
समझ में नहीं आई।
मैं हर लफ़्ज़ को पलटता हूँ,
उसकी रूह तक जाता हूँ
कि क्या ये दर्द असल में था,
या बस एक तसव्वुर,
जो मैंने ख़ुद से
उधार लिया था।
मैं काटता हूँ,
जोड़ता हूँ,
जैसे अपने ही दिल की नसें
सँवार रहा हूँ,
ताकि दर्द साफ़-साफ़ बह सके।
मैं एक शब्द हटाता हूँ,
तो लगता है जैसे
एक रिश्ता कम कर दिया हो।
मैं एक पंक्ति बदलता हूँ,
तो ऐसा लगता है
जैसे किसी याद का
मतलब ही बदल गया हो।
धीरे-धीरे
मसौदे अर्थ बनने लगते हैं,
जैसे धुंध में खड़ी कोई चीज़
अचानक आकार ले ले।
मगर अर्थ भी
पूरा नहीं होता,
वो बस एक इशारा होता है,
किसी गहरी,
अनकही बात का।
कभी लगता है
पहला मसौदा ही सच था,
एक बेढंगा,
बिखरा हुआ सच,
जिसमें कोई बनावट नहीं थी
सिर्फ़ एक कच्चा सा नुक़्सान,
एक ताज़ा-ताज़ा फ़ासला।
मगर फिर समझ आता है
सच भी अकेला नहीं होता।
उसे समझने के लिए
वक़्त की तहों से गुज़रना पड़ता है,
जैसे किसी पुराने ज़ख़्म को
धीरे-धीरे नाम दिया जाए।
इस तहरीर का मक़सद
अब कहना नहीं रहता,
समझना हो जाता है।
क्योंकि ज़िंदगी भी शायद
एक पहला मसौदा ही थी कभी,
असमझ,
अधूरी
जल्दबाज़,
उलझी हुई,
अपनी ही आवाज़ से अनजान,
और बिना विराम के लिखी गई
एक लम्बी पंक्ति।
हम उसे जीते रहे जल्दी-जल्दी
बिना समझे कि वह क्या कह रही है।
जैसे कोई इम्तिहान हो,
जहाँ वक़्त कम है
और सवाल बहुत।
मगर समझ…
हमेशा देर से आती है,
जैसे सवेरा
किसी ग़लत रात के बाद।
मैं हर दफ़ा
अपने ही लिखे को
थोड़ा-थोड़ा काटता हूँ,
जैसे कोई अपनी यादों से
कुछ बोझ हल्का कर रहा हो।
कभी-कभी लगता है
कि मैं लिख नहीं रहा,
बल्कि याद कर रहा हूँ,
कुछ ऐसा
जो कभी पूरी तरह
हुआ ही नहीं।
पर अजीब बात ये है
कि जितना मैं उसे
साफ़ करता हूँ,
वो उतना ही
गहरा हो जाता है।
शायद इसलिए कि
दर्द को मिटाने से
वो कम नहीं होता,
सिर्फ़ अपनी
जगह बदल लेता है।
अब आख़िरी मसौदा
एक बयान नहीं रहता,
बल्कि
एक इकरार बन जाता है
कि जो गुज़रा,
वो पूरी तरह
समझा नहीं जा सकता।
और जो समझ में आता है,
वो कभी पूरा सच नहीं होता।
मैं काग़ज़ बंद कर देता हूँ,
पर एक सन्नाटा रह जाता है
जैसे किसी बात का जवाब
जान-बूझ कर
अधूरा छोड़ दिया गया हो।
शायद यही तहरीर है,
और शायद यही ज़िंदगी भी।
एक पहला मसौदा
जो हमेशा अधूरा रहेगा,
और कुछ आख़िरी मसौदे
जो हमें ये सिखाते हैं कि
अब…
हर याद एक संशोधन है,
हर ख़ामोशी एक हाशिया,
जहाँ मैं खुद को दुबारा पढ़ता हूँ
और कुछ लफ़्ज़ों को चुपचाप
मरने देता हूँ।
वक़्त ने मुझे सिखाया है
कि हर याद को
समझना ज़रूरी नहीं होता,
बस उसे रहने देना होता है
थोड़ा धुंधला,
थोड़ा चुभता हुआ,
और हमेशा के लिए
अपना।
हर कविता
समझने के लिए नहीं होती,
कुछ सिर्फ़
सहने के लिए होती हैं।
और कुछ…
सिर्फ़ इसलिए लिखी जाती हैं
ताकि हम अपने ही भीतर
थोड़ा और अजनबी हो सकें।
कभी-कभी लगता है कि
मैं कविता नहीं लिख रहा,
मैं अपने ही अंदर
एक लंबी बातचीत कर रहा हूँ,
जिसका कोई अंत नहीं।
और हर मसौदा
उस बातचीत का
एक अधूरा जवाब है।
अंत में…
मेरे पास कोई
मुकम्मल नज़्म नहीं बचती,
सिर्फ़ मसौदों का
एक लंबा सिलसिला,
जहाँ हर पंक्ति
किसी अधूरी समझ की
गवाही देती है।
और मैं…
अब भी धीरे-धीरे संपादन करता हूँ,
जैसे किसी खोए हुए लम्हे को
दोबारा महसूस करना
एक उम्रक़ैद हो।
शायद यही काफ़ी है…
कि दर्द पूरी तरह समझ में न आए,
कि कुछ मायने हमेशा अधूरे रहें,
और हर आख़िरी मसौदा भी
बस एक नई शुरुआत निकले।
कुछ ख़्वाब थे जो वक़्त की गर्द में खोते गए,
हम ख़ुद को समझते रहे ‘हार्दिक’, और तन्हा होते गए।
– हार्दिक जैन। ©
इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।
कठिन शब्दों के अर्थ - (कविता के सन्दर्भ में)
1. मसौदा - किसी रचना / विचार का प्रारम्भिक रूप (मैनुस्क्रिप्ट)।
2. तहरीर - लेखन या रचना।
3. प्रतिबिंब - दूसरा रूप या झलक।
4. बुहार – झाड़कर / साफ़ करके हटा देना।
5. बेतरतीब - बिखरा हुआ।
6. वक़्ती - अस्थायी।
7. हिफ़ाज़त - रक्षा।
8. इकरार - स्वीकार करना
9. माज़ी - बीता हुआ समय / अतीत।
10. तर्जुमे - व्याख्या।
11. तसव्वुर - कल्पना।
12. संशोधन - किसी लिखी हुई बात / विचार में सुधार या बदलाव करना।
13. हाशिया – किनारा / मुख्य बात के आसपास बची हुई सोच।
14. संपादन - लिखी हुई रचना को सुधारना।
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