“मैंने यक़ीन छोड़ दिया”
“मैंने यक़ीन छोड़ दिया”
दर्शनात्मक टिप्पणी —
कविता के संदर्भ में:
इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि इंसान को केवल इसलिए किसी बात पर विश्वास नहीं कर लेना चाहिए क्योंकि उसे बचपन से वही सिखाया गया है या क्योंकि ज़्यादातर लोग उसी पर यक़ीन करते हैं। हर व्यक्ति को अपने जीवन, अपने अनुभव और अपनी समझ के आधार पर सच की तलाश करने का अधिकार है।
हर इक जवाब से पहले सवाल रखता हूँ,
मैं अपने ज़ेहन में कितना मलाल रखता हूँ।
वो आसमान की जानिब नज़र उठाते हैं,
मैं अपने पाँव तले का ख़याल रखता हूँ।
किसी ने कहा:
"यक़ीं से ही रास्ते मिलते हैं",
मैं मुस्कुराया क्योंकि मैं तर्क कमाल रखता हूँ।
अगर ख़ुदा है तो फिर ख़ामोश क्यों इतना है?
अगर नहीं है, तो मैं अपना ही किरदार रखता हूँ।
मुझमें न जन्नतों की हवस,
न दोज़ख़ों का डर,
बस एक ज़मीर है,
उसी का ख़याल रखता हूँ।
सफ़र में सच मिला तो उसे गले से लगा लिया,
जो सिर्फ़ विरासत था,
उसे सवाल रखता हूँ।
'हार्दिक'
इतना ही फ़र्क़ है मेरे और इस जहाँ में...
वो यक़ीन पालते हैं,
और मैं ऐतबार परखता हूँ।
- हार्दिक जैन। ©️
इंदौर ।। मध्य प्रदेश ।।
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