संघर्ष : एक सबक़

 संघर्ष : एक सबक़

(एक दार्शनिक नज़्म)

 

दर्शनात्मक टिप्पणी: (कविता के संदर्भ में):

 

इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि जीवन में संघर्ष कोई सज़ा नहीं, बल्कि इंसान को मज़बूत बनाने वाली सबसे बड़ी सीख है। मुश्किलें, असफलताएँ, दर्द और अकेलापन हर व्यक्ति के जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन इन्हीं अनुभवों से इंसान खुद को समझता है, बदलता है और आगे बढ़ना सीखता है।

 

उन तमाम लोगों के नाम,

जिन्होंने जीवन को कभी आसान नहीं पाया,

फिर भी हार को अपनी पहचान नहीं बनने दिया...

 

हर ज़ख़्म ने मुझसे यही पैग़ाम कहा,

संघर्ष ही इंसान का असली मुक़ाम कहा।

 

जो राह में काँटे थे, रहबर वही बने,

जो दर्द थे सीने में, हमसफ़र वही बने।

 

हर हार ने जीने का इक फ़न दे दिया,

हर अश्क ने भीतर का दर्पण दे दिया।

 

तक़दीर की तहरीर पे ऐतबार रहा,

मेहनत के सिवा कोई भी किरदार रहा।

 

जब-जब अँधेरों ने मुझे घेर लिया,

तर्क ने भीतर सूरज फिर फेर दिया।

 

मैंने दुआओं से उजाले माँगे,

बस अपने ही क़दमों से किनारे माँगे।

 

जो टूट गया, उसने सँभलना सीखा,

जो बिखर गया, उसने बदलना सीखा।

 

तजुर्बों ने आख़िर इतना तो बता दिया,

हर गिरना सफ़र का इब्तिदा बना दिया।

 

हर मोड़ पे इक दर्द का दरिया मिला,

उसी की लहरों से उम्मीद का किनारा मिला।

 

किस्मत की किताबों में यकीन कम ही रहा,

कर्मों का ही हर लफ़्ज़ मुकम्मल रहा।

 

जो वक़्त ने छीना, वही सबक़ बन गया,

जो साथ ठहरा, वही फ़लक बन गया।

 

पत्थर कोई देव हुआ, आसमान सहारा,

इंसान का रहा आख़िर इंसाँ ही सहारा।

 

कोई करिश्मा, कोई मोजिज़ा हुआ,

बस हौसलों का ख़ुद से ही सिलसिला हुआ।

 

प्रेरणा कभी बाहर नहीं मिलती कहीं,

राख में दबी चिंगारी ही रहती यहीं।

 

आँधियों ने मुझको झुकाया तो बहुत,

लेकिन मेरी जड़ को उखाड़ा न कभी।

 

बिजलियों ने सीने पे निशाँ छोड़ दिए,

जीने के हौसले मगर तोड़ न दिए।

 

मैंने तो सफ़र को ही मुक़द्दर माना,

मंज़िल से अधिक ख़ुद को मुसाफ़िर माना।

 

जो मंज़िल पर ठहरा, फ़साना बन गया,

जो चलता रहा, वह ज़माना बन गया।

 

ये उम्र भी इक रोज़ धुएँ-सी ढल जाएगी,

हर साँस किसी ख़ामोशी में मिल जाएगी।

 

नाम हमेशा रहेगा, शोहरत का शोर।

चेहरे याद रहेंगे, तालियों का दौर।

 

बाक़ी अगर कुछ होगा, तो बस ये निशाँ होगा,

मुश्किल में भी इंसान, इंसान ही रहा होगा।

 

एक सीख अगर मेरी कहानी से मिले,

तो डर से नहीं, अपने इरादों से चले।

 

क्योंकि जहाँ सोच का दीपक जलता है,

वहीं हर संघर्ष भी आख़िर ढलता है।

 

जहाँ तर्क का दीपक जलता रहता है,

वहाँ अंधविश्वास स्वयं पिघलता है।

 

जहाँ साहस साँसों में बसता रहता है,

भय अपना हर आशियाँ खोता रहता है।

 

जहाँ श्रम ही प्रार्थना बन जाता है,

असम्भव भी सिर झुका जाता है।

 

कोई ख़ुदा उतरा, कोई फ़रिश्ता आया,

हर बार इंसान ने इंसान को बचाया।

 

यही ज़िंदगी का हासिल आख़िरी लेख है, ‘हार्दिक!

न दर्द हमेशा रहता है,

न अँधेरा सदा ठहरता है।

न हार अंतिम होती है,

न तन्हाई उम्रभर रहती है।

 

वक़्त हर चेहरे को बदल देता है,

और संघर्ष ही मनुष्य को गढ़ देता है।

 

।। संघर्ष ही सबसे बड़ी प्रेरणा है; संघर्ष ही सबसे बड़ी सीख ।।

 

हार्दिक जैन ©
 
इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।

 

 

 

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