“मियाद-ए-संघर्ष”

 मियाद--संघर्ष

( हर जंग हमेशा नहीं चलती )

 

 

दर्शनात्मक टिप्पणी कविता के संदर्भ में:

 

इस ग़ज़ल के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि संघर्ष हमेशा नहीं चलता। जैसे हर दर्द, हर इंतज़ार, हर रिश्ते और हर सफ़र की एक उम्र होती है, वैसे ही इंसान के संघर्ष की भी एक सीमा होती है। एक समय ऐसा भी आता है जब इंसान हारता नहीं, बल्कि भीतर से थक जाता है। तब वह लड़ाई छोड़ता नहीं, बल्कि उसे ढोने की ताक़त कम पड़ जाती है। यह ग़ज़ल उसी ख़ामोश सच को महसूस करती है कि जीवन में सब कुछ हमेशा के लिए नहीं रहता, तकलीफ़, उम्मीद, संघर्ष। इसलिए कभी-कभी किसी का रुक जाना उसकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसकी लंबी लड़ाई की सबसे सच्ची कहानी होती है।

 

हर एक दर्द की आख़िर कोई उम्र होती है,

थकान भी अपने हिस्से की हमसफ़र होती है।

 

कोई तो वक़्त है जब चीख़ भी ख़ामोश पड़ जाए,

सदाओं की भी अजब एक मुक़र्रर उम्र होती है।

 

जो लोग रोज़ अँधेरों से लौट आते हैं,

उन्हीं की आँख में सबसे पहले सहर होती है।

 

कोई फ़ैसला होता, कोई फ़त्ह मिलती है,

अधिकतर जंग की बस एक ख़बर होती है।

 

हम अपने ज़ख़्म को हर रोज़ सीते तो रहे लेकिन,

रफ़ू की भी किसी धागे पर आख़िर हद होती है।

 

कभी तो दिल भी कहे: अब नहीं निभता मुझसे,

वफ़ा की भी किसी मोड़ पर इक उम्र होती है।

 

जो लोग टूटकर भी मुस्कुरा रहे हैं यहाँ,

उन्हें ही दर्द की असली क़दर होती है।

 

ये जिस्म रोज़ तो रोटी का बोझ ढो लेता,

मगर रूह की भी इक रहगुज़र होती है।।

 

समय ने धीरे-धीरे सब आवाज़ें कम कर दीं,

अब याद की भी बहुत धुँधली नज़र होती है।

 

मैं अब शिकायतों का हिसाब भी नहीं रखता,

हर इल्तिज़ा की आख़िर कम असर होती है।

 

हार पूरी हुई है, जीत आई कहीं,

बस आदमी की यही उम्रभर सफ़र होती है।

 

'हार्दिक' इतना ही सीखा है ज़िंदगी से मैंने,

संघर्ष की भी आख़िर कोई मियाद होती है।

 

हार्दिक जैन ©
 
इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।

 

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