“ साधना या प्रदर्शन ? ”

 साधना या प्रदर्शन ?


मैं नास्तिक हूँ, मगर तेरी आस्था से बैर कैसा,

तू सजदा कर, तू तप कर, तुझे रोकूँ मैं आख़िर क्यों?

 

मेरा सवाल सिर्फ़ इतना है, ज़रा दिल से सोचना,

जो ख़ुद के लिए था, उसे दुनिया को दिखाना कैसा?

 

छः रोज़ के उपवासों का हिसाब लिखते हो,

हर तप को तस्वीरों में सजा कर रखते हो क्यों?

 

अगर रब को ख़बर है तेरे हर एक आँसू की,

तो फिर लोगों से अपने सब्र का शोर कैसा?

 

कहीं ऐसा तो नहीं, भूख देह की कम थी

और नाम की, प्रशंसा की भूख ज़्यादा थी?

 

तप अगर अहंकार को ही और निखार जाए,

तो फिर इस त्याग में त्याग बचा ही कहाँ है?

 

करो धर्म... ये तुम्हारा हक़ है, मैं कौन हूँ रोकने वाला,

मगर धर्म जब प्रदर्शन हो जाए, तो सवाल तो होगा।

 

तप की असली पहचान ये नहीं कि कितनों ने देखा,

बल्कि ये है कि उसके बाद तुम्हें ख़ुद को

दिखाने की ज़रूरत ही न रही।

 

वरना रोज़ इबादत की तस्वीरें बदलती रहेंगी,

और भीतर का आदमी, वहीं का वहीं रहेगा।

 

सच्ची साधना शायद वही है, हार्दिक!

जिसे कोई देख न पाए,

और इंसान बदल जाए…

मगर उसे ख़ुद भी ऐलान न करना पड़े।


- हार्दिक जैन।©️

इंदौर।। मध्य प्रदेश ।।

 

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