“ बस एक साँस बाक़ी थी ”
“ बस एक साँस बाक़ी थी ”
शहर-ए-जिस्म में रात
उतर चुकी थी,
हर धड़कन अपनी बात कह
चुकी थी।
न कोई ख़्वाब था, न कोई
आहट,
बस ख़ामोशी थी, बेहद
बे-आहट।
चेहरा जैसे वक़्त से
हार गया,
हर एहसास कहीं जाकर
मर गया।
मगर सीने में कुछ था
जो चल रहा था,
शायद आख़िरी सच अभी
पल रहा था।
न कोई रूह थी, न कोई
फ़रिश्ता,
न कोई आसमाँ, न कोई
रिश्ता,
बस मिट्टी का तन था…
वह भी ठहरा हुआ,
और एक साँस थी…
जो मरना भूल गई थी।
हार्दिक, किसे ख़बर थी कि ये कैसा वजूद था,
सब कुछ ख़त्म हो गया…
मौत भी आ चुकी थी, बस कुछ साँस बाक़ी थी।
- हार्दिक जैन। ©️
इंदौर।। मध्य प्रदेश ।।
Comments
Post a Comment