“जनाज़ा-ए-यक़ीन: भरोसे का हादसा”
“जनाज़ा-ए-यक़ीन: भरोसे का हादसा”
(जिस दिन भरोसा दफ़्न हुआ)
दर्शनात्मक टिप्पणी — कविता के संदर्भ में:
यह कविता केवल टूटे हुए रिश्तों की कहानी नहीं, बल्कि उस अदृश्य मृत्यु का शोकगीत है जो इंसान के भीतर तब घटित होती है, जब उसका भरोसा मर जाता है। यहाँ किसी एक व्यक्ति की बेवफ़ाई केंद्र में नहीं है; बल्कि वह समूचा अनुभव है जहाँ हर छल, हर झूठ और हर अधूरा वादा मिलकर आत्मा के भीतर एक ऐसा कब्रिस्तान बना देते हैं, जहाँ उम्मीदें बिना शोर के दफ़्न होती रहती हैं। अंततः कवि इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इंसान लोगों से नहीं, अपने ही विश्वास के जनाज़े से हमेशा के लिए बदल जाता है।
मैंने किसी को अपनी ज़िंदगी से निकाला ही नहीं,
लोग मरते रहे… मैंने किसी को मारा ही नहीं।
मैंने कभी किसी चेहरे से किनारा किया नहीं,
जिसे अपना कहा, उसे फिर कभी बेगाना किया नहीं।
बस भरोसे की सड़क पर कुछ हादसे होते गए,
जो कभी अपने थे,
वो धीरे-धीरे खोते गए।
लोग ख़ुद ही रास्तों से मुड़ते चले गए,
मैंने किसी का हाथ कभी छोड़ा नहीं।
मेरे हिस्से की धूप भी सबको मिलती रही,
मैंने अपने आँगन की रौशनी रोकी नहीं।
कुछ लोग मुस्कराकर मेरे घर में उतर गए,
अपनेपन के बहाने दिल की तहों में उतर गए।
फिर एक दिन वही लोग आईनों की तरह टूटे,
और उनके टुकड़े मेरी रूह में बिखर गए।
मैंने दरवाज़े तो हर बार खुले ही रखे थे,
बस लौटने वाले लोग अपने रहे ही नहीं।
किसी ने झूठ को सच की तरह पेश किया,
किसी ने सच को ही इल्ज़ाम बना दिया।
किसी ने मेरी ख़ामोशी को कमज़ोरी समझा,
किसी ने मेरे यक़ीन को ही ज़हर बना दिया।
मैं टूटता रहा भीतर ही भीतर मगर,
लोगों ने उसे भी मेरा किरदार समझ लिया।
मैंने यक़ीन को कभी दस्तावेज़ समझा नहीं,
रिश्तों को कभी सबूतों में कसा नहीं।
मैंने रिश्तों को कभी उम्र से तौला नहीं,
जिसे अपना माना, फिर कभी परखा नहीं।
मगर हर एक शख़्स अपने निशाँ छोड़ गया,
और मैं हर निशाँ को मिटाता रहा, कभी रोया नहीं।
जो आँखों में सच लगा, उसे सच मान लिया,
हर धड़कन का हिसाब कभी रखा नहीं।
ज़िंदगी रेत की मानिंद हथेली से फिसली,
हर ख़ुशी आई मगर देर तलक ठहरी नहीं।
हम उम्र भर वक़्त की गिरहें खोलते ही रहे,
मगर कोई गिरह पूरी तरह खुली नहीं।
अजीब रिवायत है इस शहर की भी,
हर मुसाफ़िर यहाँ अपना ही पता भूल गया।
हर कोई अपना होने का दावा कर बैठा,
वफ़ा की बातें भी बहुत हैं, मगर वफ़ादार कोई नहीं।
हर कोई चाहता है कोई उस पर यक़ीन करे,
मगर ख़ुद किसी के लिए ज़िम्मेदार नहीं।
जब ज़ख़्म बहुत गहरे होने लगते हैं,
तो हर कोई रास्ता बदलकर चलता है।
यहाँ रिश्ते मौसम की तरह बदलते हैं,
वफ़ा के दरख़्त पत्तों-से झड़ते हैं।
मैंने किसी से बदला लेना सीखा नहीं,
नफ़रत का कारोबार करना सीखा नहीं।
जिसने जो दिया, चुपचाप रख लिया,
किसी से उसका हिसाब माँगना सीखा नहीं।
दुनिया के बाज़ार का दस्तूर ही कुछ और था,
हर मुस्कान के पीछे कोई और था।
हर सलाम में कोई मतलब छिपा मिला,
हर दुआ के पीछे कोई शोर था।
सोचता हूँ… अगर भरोसा एक जिस्म होता,
तो उसके भी कितने कफ़न बदले गए होते।
हर झूठ उसकी पसलियों में धँसा होता,
हर वादा उसके सीने पर लिखा होता।
अगर उसकी क़ब्र होती किसी वीराने में,
तो उस पर कोई फूल कभी उगता ही नहीं।
सिर्फ़ टूटे हुए वादों की धूल जमती,
और पछतावे का मौसम रोज़ बरसता।
मैंने देखा है… रूह की मौत शोर नहीं करती,
कोई चीख़ उठती है, न कोई मातम करती।
वो बस आँखों से यक़ीन उठा लेती,
और फिर उम्र भर किसी पर रहम नहीं करती।
अब न शिकायत है,
न कोई सवाल बाकी,
मेरे हिस्से में बस ख़ामोशी की कई रातें बाकी।
जिन्हें खोया, उन्हें खोने का ग़म भी नहीं,
ग़म ये है कि मुझमें अब भरोसा बचा ही नहीं।
कहते हैं… वक़्त हर ज़ख़्म भर देता है,
मुझे लगता है, बस दर्द का नाम बदल देता है।
जो भरोसा कभी साँसों की तरह ज़िंदा था,
वक़्त उसे बस यादों की तस्वीर बना देता है।
कभी-कभी सोचता हूँ… गर ख़ुदा होता तो पूछता,
किसने बनाया ये दिल,
जो इतना टूटता?
फिर ख़ुद ही हँस पड़ता हूँ अपनी इस बात पर,
जो है ही नहीं,
उससे शिकवा भी आख़िर कैसा?
अब न कोई अपना है, न कोई पराया है,
हर रिश्ता बस वक़्त का एक साया है।
मैंने किसी को अपनी ज़िंदगी से निकाला ही नहीं…
सब दफ़्न हो गए उस ख़ौफ़नाक हादसे में,
‘हार्दिक!’
जिसका नाम मैंने कभी बड़ी उम्मीद से “भरोसा” रखा था।
- हार्दिक जैन। ©️
इंदौर।। मध्य प्रदेश ।।
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