“हमसफ़र-ए-मैं”

“हमसफ़र-ए-मैं”

( स्वयं तक लौटने का शोकगीत )

 

दर्शनात्मक टिप्पणी (कविता के संदर्भ में):

 

इस कविता के द्वारा कवि अपनी सोच को व्यक्त करते हुए ये कहना चाहता है कि मनुष्य अपने पूरे जीवन में अक्सर दुनिया, रिश्तों, उम्मीदों, विश्वासों और दूसरे लोगों में अपने होने का अर्थ खोजता रहता है। लेकिन समय के साथ उसे यह एहसास होता है कि सबसे बड़ी दूरी दुनिया से नहीं, बल्कि स्वयं से होती है। यह कविता उसी खोए हुए मनुष्य की यात्रा है, जो बहुत भटकने, टूटने, निराश होने और अकेलेपन से गुज़रने के बाद अंततः अपने ही भीतर लौटता है। अंततः “हमसफ़र-ए-मैं” केवल अकेलेपन का शोकगीत नहीं है, बल्कि स्वयं तक लौटने की एक शांत, गहरी और मानवीय यात्रा है।

 

मैंने बरसों तक हवाओं से पता अपना लिया,

हर दिशा से लौटकर ख़ुद को सदा तनहा लिया।

 

भीड़ की आवाज़ में डूबा रहा दिन-रात मैं,

और ख़ामोशी ने आकर नाम मेरा पा लिया।

 

धूप कंधों पर उतरती, शाम फिर ढलती रही,

साँस अपनी ही थकान के साथ बस चलती रही।

 

वक़्त ने हर मोड़ पर इक और मौसम रख दिया,

और मेरी रूह चुपचाप उम्र भर जलती रही।

 

रात जब थककर मेरी चौखट पे सिर रख सो गई,

चाँदनी भी बुझते उजालों की धूल बिखरा गई।

 

जिसको अपना घर समझकर उम्र भर ठहरा रहा,

वह तो इक गुज़रता मौसम था, न कोई आशियाँ हुआ।

 

घर वही था, मैं वही था, फिर भी ऐसा क्यों लगा,

जैसे अपनी ही नज़र मुझसे बहुत अनजान थी।

 

मैं अकेला बैठकर दीवार से बातें करता,

दीवारों ने भी मेरी चुप्पी कहीं संजो गई।

 

एक खिड़की रोज़ खुलती, रोज़ फिर बंद हो गई,

धूप आँगन तक तो आई, देहरी पर खो गई।

 

मैंने समझा, कोई आएगा सहारा बन कभी,

उम्र लेकिन इस भरोसे की नदी में बह गई।

 

हर तअल्लुक़ फूल बनकर कुछ दिनों तक मुस्कराया,

फिर वही पत्ता हवा के साथ चुपके उड़ता पाया।

 

हर मुहब्बत ने मुझे थोड़ी-सी गर्मी तो दी,

पर धुआँ ठंडा हुआ तो राख का मौसम ही छाया।

 

मैंने अपने दर्द को तक़दीर कहकर भी जिया,

और हर आँसू को चुप रहने का फ़रमान भी दिया।

 

लोग कहते थे कि वक़्त आखिर सब बदल देता है,

वक़्त ने बदला बहुत कुछ, मगर सवाल ज़िंदा रहा।

 

मैंने मंदिर की सीढ़ियों पर भी ख़ामोशी सुनी,

और सज्दों की ज़मीं पर भी वही वीरानगी।

 

आसमानों ने कभी उत्तर नहीं मुझको दिया,

बस सितारों ने दिखाई दूरियों की रोशनी।

 

तब समझ आया… यह ब्रह्मांड किसी का ऋणी नहीं,

यह किसी की प्रार्थनाओं से कभी झुकता नहीं।

 

न कोई मंदिर बोल पाया, न कोई मिन्नत रंग लाई,

हर यक़ीं आख़िर तजुर्बे की ज़ुबाँ में ढल गया।

 

जो भी अर्थों की तलाशें लेकर इसमें चल पड़ा,

उसको अपने पाँव के सिवा कोई सहारा ही नहीं।

 

वक़्त ने हर ज़ख़्म पर चुपचाप दस्तख़त कर दिए,

ख़ून का हर क़तरा आख़िर सोच का बयान हुआ।

 

एक दिन यूँ ही थका-हारा मैं ख़ुद के पास था,

न कोई मंज़िल न कोई हमसफ़र मेरे साथ था।

 

साँस की धीमी थकान में जब उतरकर देखना सीखा,

एक भूला-सा मुसाफ़िर मेरे ही आसपास था।

 

वह कोई अजनबी चेहरा नहीं, मैं ही तो था,
भीड़ की आवाज़ में जो गुम हुआ, मैं ही तो था।


दूसरों की ख़्वाहिशों की धूल ओढ़े उम्र भर,
अपने हिस्से का ही सूरज खो चुका, मैं ही तो था।

 

वह न बोला, फिर भी उसकी चुप्पियाँ बोलती रहीं,

सूखी आँखों में दबी बरसातें सब खोलती रहीं।

 

उसने मुझसे कुछ न पूछा, कुछ शिकायत भी न की,

बीते मौसम की कोई छोटी हिकायत भी न की।

 

बस निगाहों में लिए बरसों की पहचान की नमी,

मेरी ख़ामोशी को उसने एक इबादत-सी पढ़ी।

 

मैंने देखा… वह वही था, जो कहीं खो-सा गया,

दूसरों की चाह में अपना ही चेहरा खो-सा गया।

 

जिसको दुनिया की ज़रूरत ने निरंतर बाँट दिया,

वह अकेला आदमी भीतर ही भीतर रो-सा गया।

 

मैंने काँपते हाथ से उसका थका हाथ थाम लिया,

उम्र भर का फ़ासला पल-भर में जैसे सिमट-सा गया।

 

दर्द ने पहली दफ़ा दुश्मन नहीं, दर्पण बनकर

मेरे टूटे वजूद का हर बिखराव समेट लिया।

 

फिर सफ़र वैसा ही था, धूल थी, पथराव था,

हर सुबह संघर्ष का और हर शाम घाव था।

 

फिर भी कंधों पर किसी बोझ का एहसास कम हुआ,

क्योंकि अब अपने ही होने का मुझे एहसास था।

 

अब न रिश्तों से शिकायत, न जुदाई से गिला,

न किसी वादे का बोझ, न किसी उम्मीद का सिलसिला।

 

जो मिला, जितना मिला, उतना ही जीवन की किताबों में लिखा,

बाक़ी सब बहता धुआँ था, बह गया, फिर क्या ही रह गया।

 

रास्ते मुश्किल रहे तो क्या, क़दम रुकते नहीं,

धूल ही मंज़िल बनी, धूल ही पहचान थी।

 

मैंने अपने ही सवालों को किसी पर छोड़ा नहीं,

हर गिरह आख़िर मेरे ही हाथ खुलती रह गई।

 

अब भी कुछ प्रश्नों की स्याही भीगती रहती है,

अब भी यादों की नदी चुपचाप ही बहती है।

 

कुछ कमी कभी मिटती ही नहीं,

बस वह मनुष्य का मनुष्य गढ़ती है।

 

मौत भी जब सामने होगी किसी ख़ामोश दिन,

वह भी जीवन की कथा का आख़िरी शीर्षक होगी।

 

मैंने सीखा… हार जाना अंत होता तो नहीं,

टूट जाना हर दफ़ा बिखरकर खोना तो नहीं।

 

कभी-कभी इंसान अपने सबसे गहरे शोक में,

एक नया जन्म लिखता है, मगर रोता नहीं।

 

अब भी रातें चुप हैं, अब भी चाँद आधा ही उगे,

अब भी यादों के परिंदे नींद की शाख़ों पर जगे।

 

कुछ सवालों की सियाही आज भी सूखी नहीं,

कुछ उत्तर वक़्त की मिट्टी में अभी तक हैं दबे।

 

और शायद यही जीवन का शालीन सत्य है,

हर कहानी का समापन कोई अंतिम तथ्य नहीं।

 

कुछ विरासत दर्द की भी पीढ़ियों तक चलती है,

कुछ मुलाक़ातें स्वयं से एक ही जीवन में सही।

 

उस सुबह जब मैंने अपने नाम की आवाज़ दी,

काँपती रूह ने पहली बार मुझको दाद दी।

 

रास्ते बदले नहीं, मौसम भी पहले-सा रहा,

बस नज़र ने अपनी ही परछाइयों को साध ली।

 

मैंने खुद को ही पुकारा और चल पड़ा…

 

इस दफ़ा कोई चमत्कार मेरे हिस्से न आया,

न किसी ईश्वर ने मुझको थामकर आगे बढ़ाया।

 

बस यही बदला कि सदियों से बिछड़ा एक मनुष्य

अपने ही कंधे पे सिर रख देर तक बैठा रहा।

 

लेकिन अब मैं अकेला नहीं था…

 

क्योंकि मेरे साथ कोई देवता नहीं,

कोई मसीहा नहीं, कोई भ्रम नहीं,

 

मेरे साथ अब “मैं” हूँ।

 

जिसको ढूँढ़ा उम्र भर दुनिया की हर आवाज़ में, ‘हार्दिक!’
वह मेरे भीतर ही था, मगर मैं ही उससे दूर था।

 

– शब्दों में स्वयं तक लौटने का एक प्रयास।

 

– हार्दिक जैन। ©

 इंदौर ।। मध्यप्रदेश ।।

 

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